साथ देते जो तुम रतन का ( गजल)
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कासिद को भेज, जो तुम बुलवाए न होते/
हम भी तुम्हारे पास खुद-ब-खुद आए न होते/
गुजरी हयात में चोट जो तुमसे खाई न होती,
बरबस तेरी याद से, मेरे फरिश्ते भी आए न होते/
गुलाब से भी चोट खा सकता है भला क्या कोई,
हम काँटों को अपना राजदां बनाए न होते/
प्यासे होठों ही लौटा था, मैं भी समंदर से यकीनन,
भर-भर के प्याले जाम के तुमने पिलाए न होते/
सुरूर में आए न होते, नशा नजरों में छाया न होता,
पूछते जो दर्दे- दिल की बाबत, हम छुपाए न होते/
प्यार में तुम्हारे दागे- दिल जो मसलहतन पाए न होते,
अपना समझा था तुम्हें, अपना ही बनाए होते/
सफर की धूल जो गई थी पैरहनो- लिबास पर,
लौट कर अंगूर के पानी से ही नहाए होते/
गजलों में मेरे फिर तिरा चाँद चमकने लगा है,
मेरे शेर पर सर झुकाने की अदा पे क्या न सुनाए होते/
दिलकश तेरी अदा, बाँकी चितवन, सरापा नूरे- बदन,
मेरे सुखन की शाहजादी कोई और नहीं, समझाए होते
कली बागों में रिवली, फिजां में खुशबू फैल रही,
तुम बुलाते, गुजरगाहों से कैसे गुजर के न आए होते/
अलग- अलग शक्ल, साहिल की रेत पर हवा बनाती,
उसमे एक अक्स मेरा था, वे अक्स काश! तुमने मिटाए न होते/
निशानियाँ प्यार की तुमको सौंपी थी हमने बाजतन,
काश! दरमियां हमने रिश्ते बनाए न होते/
गर तुमसे मिलना इतना आसां होता मेरे लिए,
जमीनों- आस्मानों के कुलाबे हमने मिलाए न होते/
कमन्द स्ट्रीटलाइट के स्टैंड पर फेंक कर,
तेरी खिड़की तक हम भी नआ पाए होते/
जानते हैं हकीकते- मुहब्बत, चार दिन का झमेला,
कैशो- लैला, शीरी- फरहाद साथ नजर आए न होते/
कश्तियाँ प्यार की रूख मोड़ देती हैं, राहे- पनघट की,
साथ देती जो तुम' रतन' का, हम संगम में नहाए होते/
राजीव रत्नेश
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