तुझे आजाद परवाना देखता हूँ
--- राजीव रत्नेश
तेरी नजरों का सधा निशाना देखता हूँ/
हर अदा तेरी कातिलाना देखता हूँ/
बिछी है प्यार की शतरंज की ये बिसात,
तेरी हर चाल को शातिराना देखता हूँ,
चली आ एक बार मेरी महफिल में,
तेरी खामोशी में सिमटा जमाना देखता हूँ/
कल रात आई थी मस्जिद में सज्दा करने,
तेरी इबादत में कुछ हक अपना देखता हूँ/
इक तूफान उठा था मेरे एक मिसरे से,
तेरे गाल के तिल में इक फसाना देखता हूँ/
जरा खोल अपने होठों के ये चुंबक,
मैं अपने होठों को तेरी ओर आता देखता हूँ/
अब मौन न रह, मुहब्बत का तूफान उठा दे,
वरना जलता हुआ ये आशियाना देखता हूँ/
तेरी दिलेरी तेरे बाप ने भी सहन न की,
मैं तो बस तेरे लबों का कहा देखता हूँ/
इश्क के दरबार में अनारकली भी थी कभी,
मुहब्बत के आगे कब दौलत को टिका देखता हूँ/
किस शय से आकर तू उलझ गया ' रतन ',
तुझे तो हमेशा से आजाद परवाना देखता हूँ//
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