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खता क्या हुई कुछ याद नहीं/
कोई तस्वीरे- बुतां पास नहीं/
लहरें गिन क्या बताऊँ,
कतरे की औकात नहीं/
दिल्ली का बाशिन्दा हूँ,
जानूँ मसूरी, नैनीताल यहीं/
साजन हूँ अपनी सजनी का,
जिसका नैहर और ससुराल यहीं/
सावन का महीना बड़ा मतवाला,
मोर-मोरनी करते कदमताल यहीं/
आसान नहीं कुछ कह देना यहाँ,
बिन बात होती हड़ताल यहीं/
जमीं से लगे हैं पैर मेरे,
सर का आधार आस्मान सही/
वही खुदा है पयम्बर है,
जिसका लेते सब नाम यहीं/
पहली बार जब आया यहाँ' रतन',
निछावर किया दिलो- जान यहीं//
राजीव रत्नेश
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