Sunday, July 12, 2026

किसी सुबह की आहट बाकी है ( गजल )

मैं उलझनों का शिकार हो गया हूँ,
लगता है दिल से बीमार हो गया हूँ/

एक अनजान सी सूरत दिल में बसा के,
खामोश हूँ-- मैं भी कितना नादान हो गया हूँ/

खुद की ही आवाज से डरने लगा हूँ,
शायद अपने ही विचारों का शिकार हो गया हूँ/

जो रास्ते कभी आसान लगे थे,
अब उन्हीं मोड़ों पर बेकरार हो गया हूँ/

कुछ सवाल दिल में ठहर से गए हैं,
कुछ जवाबों का इंतजार हो गया हूँ/

फिर भी कहीं एक दीप जलता है,
शायद अभी पूरी तरह हर नहीं गया हूँ/

किसी सुबह की आहट बाकी है मुझमें ' रतन '
मैं बस थोड़ी देर का अंधकार हो गया हूँ/

                राजीव रत्नेश
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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!