बुझते हुए खवाबों को फिर अंजाम देना/
साज मैंने छेड़ा मोहब्बत की राहों में
मुझे जरा तुम अपनी आवाज देना/
अगर मिलो तो मुस्करा कर मिलना,
मेरी तन्हाई को थोड़ा सा आराम देना/
मैं इश्क की बाजी जीतना नहीं चाहता,
बस अपने अहसासों को थोड़ा मुकाम देना/
अगर मेरी मुहब्बत तुम्हारी मंजिल न बने,
जाते-जाते मुझे दुआओं का पैगाम देना/
मैं शिकायतों का सफर नहीं लिखूँगा,
तुम बस अपनी यादों का एक जाम देना/
किस्मत में लिखा हुआ ही अंजाम होगा,
मुझे बस अपने दिल में एक शाम देना/
मैं उल्झनों में भी मुस्कुरा लूँगा ' रतन '
तुम मेरी खामोशी को भले इल्जाम देना/
राजीव रत्नेश
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