रतन किससे करे गिला ( गजल )
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कब से तू जाने मेरा हमनवा हो गया/
तेरा दिया दर्द ही अब मेरी दवा हो गया/
जिसको समझा था कभी दिल का बड़ा दुश्मन,
वही जाने कब मेरे दिल की सदा हो गया/
तेरी महफिल में मेरा जिक्र हुआ जबसे,
मेरी तनहाई का हर पल भी नया हो गया/
तेरी आँखों ने जो खामोश इशारा कर दिया,
मेरे कहने को रहा क्या, सब बयाँ हो गया/
हमने चाहा था जिसे भूल के जीना लेकिन,
वही चेहरा मेरी साँसों की हवा हो गया/
दर्द देता रहा तू उम्र भर इतना मुझको,
दर्द सहते- सहते दिल भी खुदा हो गया/
मैंने माँगा था तुझसे प्याला शराब का,
तुझे देख कर ही मुझे नशा हो गया/
जलती- बुझती रोशनियाँ तेरी कोठी सजाती रही,
तेरे चीखते जख्मों की मैं दुआ हो गया/
जो गुजर गया फसाना, उसको कुरेदें ही क्यूँ,
जख्म वो भर गया, इक नया दर्द पैदा हो गया/
मस्जिद से अजान सुनाई देती रही,
तेरी चाहत कुबूल हुई, हर सज्दा दुआ हो गया/
फैसला हुआ तो ये हुआ, तू ही मेरी चंदा थी,
तुझसे खुल्लम खुल्ला मिलने का रास्ता हो गया/
कमरे से मेरे गई तो हर तरफ अँधेरा हो गया,
बैठे-बिठाए मेरा तो खसारा हो गया/
तू बिछड़ी क्यों थी मुझसे, इतने दिन मायके रही,
तेरे- मेरे दरमियाँ कहाँ से ये जमाना हो गया/
' रतन ' अब किससे करे अपने फसाने का गिला,
जिससे शिकवा था वही दिल की दुआ हो गया/
राजीव रत्नेश
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