------ राजीव रत्नेश ' रतन '
भूमिका: मुहब्बत में नफा-नुकसान का हिसाब कौन
रखता है? शम्अ जलती है, परवाना मिटता है और
दुनिया पूछती रह जाती है कि हासिल क्या हुआ/
यह गजल उसी बेनियाजी को समर्पित है/
गजल:
शम्अ जलती रही, मुहब्बत का हासिल हुआ न हुआ,
ख्वाहमखाह इश्क में परवाना गाफिल हुआ न हुआ/
भीड़ में वो मुझे पहचान सका या न सका,
उसकी महफिल में मैं शामिल हुआ न हुआ/
डूबना ही था मुकद्दर तो शिकवा कैसा,
सामने मौज के साहिल हुआ न हुआ/
इश्क में जाँ से गुजरना ही मुकम्मल है यहाँ,
इस रह- ए- पुरखार में कामिल हुआ न हुआ/
हँस के सहते रहे हर जख्म जमाने के,
दर्द का कोई भी कातिल हुआ न हुआ/
उम्र भर जिसकी तमन्ना में भटकते रहे हम,
वो मेरी राह का मंजिल हुआ न हुआ/
हर कदम पर था सफर में इम्तिहाँ का सामना,
राह में कोई मुकाबिल हुआ न हुआ/
रोशनी बाँटी है जिसने खुद का जला कर रात भर,
उसकी खातिर कोई काइल हुआ न हुआ/
जिंदगी भर दर्द की दौलत समेटी है '' रतन ",
मैं भी इस दर का साइल हुआ न हुआ//
शब्दार्थ
गाफिल: बेसुध, बेखबर
कामिल: पूर्ण, सिद्ध
पुरखार: काँटों भरा
काइल: सहमत, प्रशंसक
साइल: माँगने वाला, याचक
मुकाबिल: सामने आने वाला
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