--------- राजीव रत्नेश " रतन"
भूमिका:
कुछ लोगों की मांगें बहुत छोटी होती हैं/ न तख्त, न ताज,
बस वफा की एक अदना सी मुराद/ पर जब वही मुराद
न मिले तो दिल की फरियाद ही इंकलाब बन जाती है/
यह गजल उसी विनम्र बगावत की दास्तान है, जोशोर
नहीं करती, बस अपना हक माँगती है/
गजल:
वफा की इक अदना- सी मुराद ही तो चाही थी,
दिल ने इंकलाब की फरियाद ही तो चाही थी/
शगूफों से बगावत की आस न थी कोई मुझको,
बस अपने हक की सदा और याद ही तो चाही थी/
महलों की हसरत कब थी, तख्त- ओ- ताज कब माँगे,
इस बेघर दिल ने घर की बुनियाद ही तो चाही थी/
कफस में रह कर भी, ऐ सय्याद, तुझसे मैंने,
परवाज नहीं, रुहे- आजाद ही तो चाही थी/
दुनिया ने जिसे शोर कहा, वो मेरी जानिब से,
सोए हुए जमीरों की इमदाद ही तो चाही थी/
हजार रंजिशें थीं, पर तेरे लबों से तो बस,
इक नर्म- सी लफ्ज- ए- इरशाद ही तो चाही थी/
ऐ" रतन" इतनी-सी तेरी खता पर है जमाना बरहम,
तूने तो बस वफा की इक दाद ही तो चाही थी//
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शब्दार्थ:
मुराद: मन की इच्छा, मनोकामना
फरियाद: गुहार, शिकायत भरी पुकार
इंकलाब: क्रांति, बदलाव
शगूफा: हँसी-ठिठोली की बात, खिलती कली
सदा: आवाज या पुकार
बुनियाद: नींव
कफस: पिंजरा या कैद
सय्याद: शिकारी, चिड़ीमार
परवाज: उड़ान
इमदाद: मदद, सहायता
इरशाद: कहना, फरमाना
बरहम: नाराज, खफा
दाद: प्रशंसा, सराहना
राजीव रत्नेश " रतन "
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