Wednesday, October 21, 2026

इंकलाब की फरियाद गजल

शीर्षक: इंकलाब की फरियाद( गजल)
--------- राजीव रत्नेश " रतन"

भूमिका:

कुछ लोगों की मांगें बहुत छोटी होती हैं/ न तख्त, न ताज,
बस वफा की एक अदना सी मुराद/ पर जब वही मुराद
न मिले तो दिल की फरियाद ही इंकलाब बन जाती है/
यह गजल उसी विनम्र बगावत की दास्तान है, जोशोर
नहीं करती, बस अपना हक माँगती है/

गजल:

वफा की इक अदना- सी मुराद ही तो चाही थी,
दिल ने इंकलाब की फरियाद ही तो चाही थी/

शगूफों से बगावत की आस न थी कोई मुझको,
बस अपने हक की सदा और याद ही तो चाही थी/

महलों की हसरत कब थी, तख्त- ओ- ताज कब माँगे,
इस बेघर दिल ने घर की बुनियाद ही तो चाही थी/

कफस में रह कर भी, ऐ सय्याद, तुझसे मैंने,
परवाज नहीं, रुहे- आजाद ही तो चाही थी/

दुनिया ने जिसे शोर कहा, वो मेरी जानिब से,
सोए हुए जमीरों की इमदाद ही तो चाही थी/

हजार रंजिशें थीं, पर तेरे लबों से तो बस,
इक नर्म- सी लफ्ज- ए- इरशाद ही तो चाही थी/

ऐ" रतन" इतनी-सी तेरी खता पर है जमाना बरहम,
तूने तो बस वफा की इक दाद ही तो चाही थी//

             """"""""""""""""""""""
शब्दार्थ:
मुराद: मन की इच्छा, मनोकामना
फरियाद: गुहार, शिकायत भरी पुकार
इंकलाब: क्रांति, बदलाव
शगूफा: हँसी-ठिठोली की बात, खिलती कली
सदा: आवाज या पुकार
बुनियाद: नींव
कफस: पिंजरा या कैद
सय्याद: शिकारी, चिड़ीमार
परवाज: उड़ान
इमदाद: मदद, सहायता
इरशाद: कहना, फरमाना
बरहम: नाराज, खफा
दाद: प्रशंसा, सराहना

          राजीव रत्नेश " रतन "
           """""""""""""""""""""""""""

No comments:

About Me

My photo
ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!