------ राजीव रत्नेश " रतन "
भूमिका:
कहते हैं मौत हर रिश्ते पर पर्दा गिरा देती है/ पर कुछ
रिश्ते ऐसे होते हैं, जो कब्र की मिट्टी से खुशबू बन कर
उठते हैं/ शिकायतें घुल जाती हैं, और जो बचता है, वह
सिर्फ मुहब्बत है---- पहले से ज्यादा बेचैन और ज्यादा
गहरी/ यह गजल उसी बिछड़े हुए मह महबूब की याद
को समर्पित है/
गजल:
शिकायतें जज्ब हुईं, तुरबत से तेरी खुशबुएँ आने लगीं,
हलचल मेरे दिल में मची, आरजुएँ शोर मचाने लगीं/
बरसों जो खामोश रही थीं, बंद दरीचों के पीछे कहीं,
वो सदाएँ फिर मुझे रह- रह कर सामने बुलाने लगीं/
जिन चरागों को बुझा आए थे हम तेरी मजार पर,
हवाएँ आ आ कर फिर उनको जलाने लगीं/
जख्म जो सिल दिए थे वक्त ने, ऐ जान- ए- वफा,
तेरी यादें अब उन्हीं को फिर से सहलाने लगीं/
जो कह न पाया तुझसे जीते-जी मैं कभी, कहीं भी,
बातें वो सारी की सारी साँसें मेरी तुझे सुनाने लगीं/
रात होते न होते तेरी यादें चाँदनी का परचम बनकर,
मेरे सीने की खला को खुल्लमखुल्ला जगमगाने लगीं/
" रतन " तू जिसके लिए उम्र भर मर- मर कर जीता रहा,
वो वफाएँ खाक में भी साथ रहने का वादा निभाने लगीं//
""""""""""""""""""
शब्दार्थ:
जज्ब: भीतर समा जाना, घुल जाना
तुरबत: लहद, कब्र, मजार, समाधि
आरजू: इच्छा, तमन्ना
दरीचा: खिड़की, झरोखा
सदा: पुकार, आवाज
जान- ए- वफा: वफ़ा की जान, प्यारा महबूब
खला: खालीपन, रिक्तता
वफा: निष्ठा, निभाने का वादा
""""""""""""""""
राजीव रत्नेश" रतन"

No comments:
Post a Comment