Thursday, June 25, 2026

एक दुआ मेरे नाम से ( गजल )

एक दुआ मेरे नाम से  ( गजल  )
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तेरा दिया जख्म दिल में ही फले-फूले, बाहर न आए /
मेरे गमो- नाले खुद ही, तेरी जुबां पे कहीं आ न जाएँ /

मैं तुझे पुकारूँ पर भूल कर भी सुध न तू मेरी ले,
मुझे भूल जाने वाले याद न तुझे कभी मेरी आए /

तेरे ऐब सारे, अकेले मेरे हिस्से में ही आएँ,
मेरे हुनर सारे सिर्फ तेरे कब्जे में ही आएँ /

न तू याद मुझे करना, न मैं करूँ कभी याद तुझे,
मेरे हिस्से की सभी खुशियाँ, तेरे दामन में समाए /

आज बरकत की अपनी शुभ घड़ी में, न कर मुझे याद ,
खुशी-खुशी तू डोली में बैठ, और के घर जाए /

मैं न करूँगा तुझसे कभी प्यार का तगादा, भले,
मेरे दिल के चिराग से औरों का चिराग जलाए /

मुब्तिला था कभी साथ- साथ तेरे, प्यार के बंधन में,
आज क्या बात कि दिल मुझे तेरी हिरासत से निकाले 

वीरासत में मिला है तुझे जो अमानते- गुरुरो- हिजाब,
मुझे तो लूटा नाजो- अदा से, इसी तरह आगे काम आए /

दुआ है मेरी, पहली आदमजाद, जो तेरी कोख से जन्मे,
उसके लब पे पहले-पहल मेरा ही नाम आए /

मैं मजबूर हूँ तो इस कदर, तू अब न सता,
खुदा न करे, दुश्मन की जगह मेरे लब पे तेरा नाम आए /

मुहब्बत की कैफियत मेरी, तूने जरा भी तो समझी नहीं,
फिर क्यूँ तेरे लिए ही, जान भी मेरी ही जाए /

नज्मे- फरियाद भी बेअसर हो गए मेरे तेरे सामने,
सुनी न किसी की, बहाने तूने बेपनाह बनाए /

बड़ी मौजूं हो रही थी महफिल वजूदे- दिलदार से,
की तूने सख्ती, दिल को भींच कर लहू टपकाए /

तवील तेरी दास्तां को मुख्तसर मैंने किया है,
वरना बात पहुंचती जाकर कहीं सितारों के भी आगे /

कोई ख्वाबे- पसंदीदा, कोई अरमां न मेरे दिल में रहा,
आकर मेरा दामन तू थाम भी ले, तो तबस्सुम न लब पे आए /

करें ' रतन ' मुहब्बतों में सजदा तेरे लिए मस्जिद में,
भेज दें अल्ला- ताला एक दुआ मेरे नाम से, जो तेरे पास आए //

                  राजीव रत्नेश
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" जिसकी डोली किसी और के आँगन में उतर गई,
रतन की दुआ में वो आज भी खुदा की इनायत बन गई /"

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