Sunday, July 12, 2026

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई ( कविता )

मेरी अंतर्व्यथा शायद कोई समझता तो अच्छा होता,
कल हमने- तुमने नवसृजन का सपना देखा था शायद/
तुमको याद हो कि न याद हो, कल के बिछड़े मिलेंगे,
ऐसा ही कुछ अंजामे- वफा हमने साथ देखा था शायद/

मेरी अंतर्व्यथा शायद शब्दों में पूरी उतर न सकी,
कुछ पीड़ाएँ खामोशी की जुबान में ही पलती हैं/

कल नवसृजन का जो स्वप्न साथ बुना था हमने,
आज उसकी राख में भी कुछ चिंगारियाँ जलती हैं/

आपको याद हो न याद हो, उन वादों की वह शाम,
हमने भी कभी आने वाले कल की तस्वीर सँवारी थी/

' कल के बिछड़े आज मिलेंगे '-- यही विश्वास था हमें,
इसी उम्मीद में हमने कितनी रातें साथ गुजारी थीं/

अंजाम- ए- वफ़ा की राह आसान कहाँ होती है,
मगर हमने तो हर मोड़ पर साथ चलने की ठानी थी/

अब जो फासले हैं, उन्हें भी एक कहानी मान लेते हैं,
क्यूँकि कुछ रिश्ते दूरी में ही अपनी निशानी रखते है/

              राजीव रत्नेश
           """""""""""""""""""""""

No comments:

About Me

My photo
ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!