ये भी सच है ,मैं ही नथा दीवाना ,
तुम थी शैतान की खाला।
बातें मुझसे थीं और ,
गैर से था याराना।
पर्वत -शिखर पर पँहुच कर ,
हौले -हौले उतर आना ,
तेरी यादों को ,तेरी बातों को ,
शून्य में गूँजने को छोड़ देना।
अंतर्मन ने मेरे माना ,
तुम हो नहीं सकती किसी की भी ,
तुम बेवफा थी ,बेवफा बनोगी ,
अच्छा होगा ,तेरी राह से हट जाना .
-------राजीव रत्नेश -----------

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