Monday, February 17, 2025

KHA GAYEE CHOCLATE HAMAREE .

तेरे -मेरे बीच ,जो कुछ भी हुआ ,
वे बातें नाजायज या गैरमुनासिब न थीं। 
इतनी पाकसाफ भी तुम न थी। 
फिर मेरे लबों को ,अपने लबों की ,
हरारत देने के लिए ,
पास मेरे बार -बार आती क्यूँ थी। 
सट -सट के बैठती थी मेरे पास ,
मेरे खून में भी तपन कम न थी। 
ये माज़रा क्या था ,इरादा क्या था ,
हमने तो कुछ न कहा ,इस बाबत कुछ भी। 
मेरी आगोश था तेरा सलोना बदन ,
रिहाई की कोशिश भी तुम्हारी न थी। 
थिरकते लबों पे ,रुखसारों पे तब्बसुम ,
फिर भी तुम्हारे वालिदैन का जवाब था नहीं 
अपने सुर्ख गालों सहन की नक्काशी मेरी ,
फिर अपने को बेक़सूर बताने की ज़रुरत क्या थी। 
अपने किसी अफ़साने में तुम्हें किरदार करते ,
पर शोले भड़काने में माहिर तुम्हीं थी। 
ऐसी तो न  थी शकल ,बेच खाई थी अकल ,
खा गई पेशे -खिदमत चॉक्लेट हमारी। 
-------राजीव रत्नेश ---------

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