वे बातें नाजायज या गैरमुनासिब न थीं।
इतनी पाकसाफ भी तुम न थी।
फिर मेरे लबों को ,अपने लबों की ,
हरारत देने के लिए ,
पास मेरे बार -बार आती क्यूँ थी।
सट -सट के बैठती थी मेरे पास ,
मेरे खून में भी तपन कम न थी।
ये माज़रा क्या था ,इरादा क्या था ,
हमने तो कुछ न कहा ,इस बाबत कुछ भी।
मेरी आगोश था तेरा सलोना बदन ,
रिहाई की कोशिश भी तुम्हारी न थी।
थिरकते लबों पे ,रुखसारों पे तब्बसुम ,
फिर भी तुम्हारे वालिदैन का जवाब था नहीं
अपने सुर्ख गालों सहन की नक्काशी मेरी ,
फिर अपने को बेक़सूर बताने की ज़रुरत क्या थी।
अपने किसी अफ़साने में तुम्हें किरदार करते ,
पर शोले भड़काने में माहिर तुम्हीं थी।
ऐसी तो न थी शकल ,बेच खाई थी अकल ,
खा गई पेशे -खिदमत चॉक्लेट हमारी।
-------राजीव रत्नेश ---------

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