जाने -महफ़िल हो ,हाले -दिल हो ,क्या -क्या हो तुम
दूर से नजारों को मैं क्या देखूँ और तुम्हे क्या दिखाऊँ ,
करीब आके क्या नज़र आएगा ,मैं तुम्हें क्या बताऊँ।
चिरागे -दिल जलाऊंगा ,तुम्हें अपनी बनाऊंगा ,
अगर तुम आओगी ,क्या -क्या मैं तुम्हें बताऊँ।
परवाना तुम्हारा अभी तक घिसट रहा है ,
शहद उसे मिला नहीं अभी तक ,तुम्हें क्या मैं बताऊँ।
नज़रों से दूर उसे तुमने कर दिया है ,
हाले -तम्मना उसका ,तुमको क्या मैं बताऊँ।
अगर सुलग जाती आग अम्बर में ,फूँक उसको मैं देता ,
जो घिसट रहा उड़ने की कोशिश में ,तुम्हें क्या मैं बताऊँ।
आओगी जब मेरे पास ,मंज़र ये भी देखोगी ,
पास तुम्हारे कोई पहुँच भी न पायेगा ,पराग फूलों काभी पाकर ,
वो चल न पायेगा ,अपने पैरों पर भी खड़ा न हो पायेगा ,
पास अगर मेरे तुम होती ,हाल उसका तुम्हें मैं दिखाता ,
अब हॉल उसका तुम्हें क्या मैं बताऊँ।
जिगर में दर्द लिये यूँ ही छटपटायेगा ,
उड़ा दूँ उसे तो उड़ भी जायेगा ,
नहीँ तो शमां की मोह्हबत में जल मरेगा
अब ये बात तुम्हें क्या मैं बताऊँ।
पास आओ या दूर जाओ ,फर्क उसको कुछ नहीं पड़ेगा ,
यूँ ही घुट -घुट कर मर जायेगा ,पर पास न तुम्हारे आएगा ,
आग लगी है कैसी ,तुम्हें क्या मैं बताऊँ।
----------राजीव रत्नेश -----------

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