Monday, March 30, 2026

दो बोल बोल दे साकी ( कविता)

दो बोल बोल दे साकी!
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दिल आज बहुत उदास है मेरी साकी!
तेरी महफिल में आज आखिरी रात है साकी!
तेरी बज्म छोड़ कल मुझे जाना होगा,
आज तो लबों से दो बोल प्यार के बोल दे साकी!

अब जाने किधर होगी अपनी राह साकी!
न मंजिल का पता है, न कोई ठिकाना साकी!
आज फिर से एक बार नजरे- मय पिला दे,
अपनी किस्मत में कोई कल का भरोसा नहीं/

किसी और मयखाने में ऐसी लज्जत नहीं साकी!
जो चढ़ा सकूँ तेरी आगोश में सर रख के ही,
अब न तेरा पहलू मिलेगा, न फिर आगोश वही,
आज तो लबों से दो प्यार के बोल बोल साकी!

तेरे मयखाने में रिन्द हैं बड़े- बड़े,
पर उनको मुफ्त यहाँ कभी मिलती नहीं,
मैं ही बेहिसाब पीता था, रखती थी तू हिसाब नहीं,
दिल कहे तो लबों से दो प्यार के बोल बोल साकी!

गिरफ्तारे- मुहब्बत हूँ तेरा, महफिल भी तेरी,
हम सुखनवर तो हैं, मजलिस की तेरी,
नजर से ही पैमाना तक पी जाते हैं, हम पीने वाले,
तुझे तो मालूम है हकीकत मुहब्बत की मेरी/

नजरें मेरी बापाबंद हैं, तेरे नजारे से भी,
आजा ढ़लती रात में ही, मेरे इशारे पे ही सही,
दिल अता किया था, जान भी कुर्बान मेरी,
दिल कहे तो लबों से दो प्यार के बोल बोल साकी!

मेरे जाने की खबर से तू क्यूँ परीशान है साकी!
दिलबर और तुझे मिल जाएँगे, मैकदा न होगा खाली,
आज मेरे लबों की गुलाबी, अपने लबों की थिरकन में समेट ले,
कल और कौन होगा दहलीज पे तेरे सरनिंगूँ साकी!

देख अब और ज्यादा फासला मुझसे न बढ़ा,
मैं ही निकाल के लाऊँगा तुझे, सुरूर के दरिया से ,
अपना फसाना तुझी से तरन्नुम में सुनूँगा,
एक बार प्यार से दो बोल गुनगुना दे साकी!

जिधर तेरी जुल्फों की छाँव न होगी,
उधर ही अब मेरी राह होगी साकी!
चलना होगा अब काँटों भरी डगर पर,
मंजिल भी न कोई मेरे सामने होगी/

जमाना तो मुद्दई- ए- मुहब्बत सदा रहा है,
यही सोच तुझसे अब मैं जुदा हो रहा हूँ,
अपनी महफिल मेरे सिवा ही करना आबाद,
चलते-चलाते दो प्यार के बोल बोल साकी!

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