दूर देश जाकर भी काश!
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नज्म--- राजीव रत्नेश
दुनिया में अगर
मुहब्बत और खुलूस न होता,
तो जर्रे से जुड़े जर्रे का
कोई फसाना न होता/
पृथ्वी अपनी धुरी से
गर जरा सा हट गई होती,
तो सोचो-----
इस दुनिया का
क्या ठिकाना होता/
मुहब्बत ने ही तो
हमको तुमसे,
और तुमको हमसे
बाँधे रखा है;
वरना
हम, हम न होते,
तुम, तुम न होते/
मैंने माँगा ही क्या था तुमसे---
फिर क्यों खफा हो बैठे?
क्या चाहा था मैंने,
जो तुम
बदगुमां हो बैठे?
जिंदगी का गुलशन
शांत था,
अपनी ही लय में साँस ले रहा था,
तुमने जोर- ओ- सितम से
मुझे आजमाया न होता,
तो उसमें
बगुला भी न उठता/
मुहब्बत दुश्मन नहीं होती,
जमाना भी दुश्मन नहीं होता---
अगर तुमने
किसी और से मिल जाने का
इरादा न किया होता/
देखो,
सागर की उत्ताल तरंगे भी
एक दूसरे से बँधी रहती हैं;
ज्वार न आता
तो कश्ती भी
साहिल से न टकराती/
यह जमाना
आज भी मुहब्बत का दीवाना है,
मैं यह जानता हूँ____
मगर तुम दूर हुए
तो तुम्हारी याद ही
मेरा सहारा बन गई/
मुहब्बत बरगलाती नहीं
बस हर बार
आवाज भी नहीं उठाती,
मैं जानता हूँ----
तुम साथ रहते
तो शायद
मेरा गुजारा न होता
फिर भी....
काश!
तुम मेरी महफिल में आ गए होते,
एक जाम की बस
इतनी-- सी कसक थी-----
तुम मेरे थे,
मैं तुम्हारा था,
अपने हाथों से तुमने
मुझे जाम पिलाया होता/
मछली तटबंध से
क्यों उलझी-----
तुम जानो, तुम समझो
काश!
उस काँटे में
तुमने चारा लगाया न होता/
अब किसी की उलझनों में,
खुद को उलझाता नहीं हूँ,
ऐसे मौकों पर
खामोशी ही
अख्तियार करता हूँ/
लेकिन ' रतन '
तेरी मुहब्बत से
कभी गाफिल न था----
न तब,
न आज/
बस एक बात
दिल में रह गई है---
दूर देश जाकर भी,
काश!
तुमने निभाया तो होता/
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