समझो तो रतन का इशारा क्या है ( गजल )
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मुझे याद आने वाले आखिर तू कहाँ छुपा है/
तेरा नया ठिकाना क्या है, तेरा नया पता क्या है/
तुम क्या जानो, तुम्हारी हसरत मेरे दिल को है,
मैं नहीं समझ पाता, दिल को मेरे हुआ क्या है /
जनम-जनम का साथ तेरा-मेरा, तू कहाँ भटक गया,
मेरी मुहब्बत तेरे दम से है, तुमसे भला छुपा क्या है /
आजा बस एक बार को ही, सूरत अपनी दिखा जा,
मामला क्या है और तू किस बात पर खफा है /
तुमसे ही हसरते- दिल की बात मैंने कही थी,
बुरा मान गया तू, आखिर मैंने कहा क्या है /
मुहब्बत में तेरे, सरफरोशी तक की तमन्ना भी मेरी,
समझ न आया मेरे, तेरे मुहब्बत का सिला क्या है /
आजा अपनी महफिल में, एक बार को ही जो तू,
पिला न पाओ जामे- लब, फिर तेरा फैसला क्या है /
मैंने कहा था कोई नई बात हो तो मुझसे कहना,
चुप सी लगा रखी है तुमने, आखिर इरादा क्या है /
मजनूं को लैला, रांझा को हीर तो मिल न सकी,
बेवजह रोड़े अटकाता बीच में, ये जमाना क्या है /
तीर कमान पे चढ़ाकर, निशाना आस्मां का किया,
दिल बेहाल, खस्ताहाल हुआ, आखिर माजरा क्या है /
मशहूर तुम जमाने में, तेरा हौसला खुद में बड़ा है,
मेरी मुहब्बत को आखिर तुमसे मिला क्या है /
इश्क में तुम्हारे, अगर दिल बीमार ही हो गया मेरा,
बाप तेरा' हकीम लुकमान' का शागिर्द, पूछ दवा क्या है /
छोड़ कर महफिलें सारी, तू बस मेरी गिरफ्त में आजा,
यह बात कहने में, समझो तो जरा ' रतन ' का इशारा क्या है /
राजीव रत्नेश
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तेरी मेरी जिन्दगी के बीच फासिले तो कभी न थे
कहाँ से रास्ता हम भूले, दरमियां किनारे तो कभी न थे
राजीव रत्नेश
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" जमाना चाहे जितनी दीवारें खड़ी कर दे, रतन की राहों में ,
वो आज भी मुकम्मल सुकून पाता है, सिर्फ चंदा की बाहों में //
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