याद आ गया गुजरा जमाना ( गजल )
++±++++++++++++++++++++
तुझसे शुरू होकर बात तुझी पे खत्म होती है/
जमाना देखने के बाद, तेरी सूरत पे बात खत्म होती है/
हाजिरे- हुजूर यही कहानी है, यहाँ दर्द की ही बिसात है,
हुजूम उमड़ा बस्ती में, तेरी सूरत पे बात खत्म होती है/
जाने कैसे मंगतों पर भी तेरी दुआ बरस पड़ी,
हासिले- मुकद्दर है तू, तेरी हर बात मेरी मन्नत होती है/
जाने किसने दर्द का सागर, मेरे दिल में उड़ेल दिया,
कोई भी इल्तजा हो, तेरी अंजुमन में खत्म होती है/
बेकरार नजर को मेरे, एक बार सब्रो- करार तो दे,
मेरी हर कहानी जो भी हो, तुझी पे जाकर खत्म होती है/
गिरहबाने- मुहब्बत कुछ यूँ खुल कर बिखर गई,
तेरी हर दुआ आखिर को मेरी नक्शे-कदम होती है/
मंजूर थी मुहब्बत तेरी तो सारे जुल्म सहन कर लिए,
कुछ इसी तरह से तो पैदाइशे- आदम होती है/
गिला जमाने को था मुझसे, तेरी तो बात कुछ न थी,
अदावत थी तो मुझसे थी, जान कभी कम हुई न खत्म होती है/
रहगुजर पर तेरे, हर कहीं फूल मैंने बिछाए थे,
राहे- मंजिल तेरी आसान हो, इसी तरह अदावत खत्म होती है/
तुम आओ या न आओ, मजबूरी पर तुझे कुछ न कहेंगे,
मेरी तरह दरिया पार आओ, इधर से भँवर कम होती है/
मंजिल का रास्ता था, खौफो- खतर से भरा हुआ,
रास्ता बदलो, उस रास्ते तेरी नकहत कम होती है/
करना न खुद को कभी हवाले- सय्याद, किसी देश का हो,
ले जाके तुम्हारा करेगा व्यापार, इससे कीमत तुम्हारी कम होती है/
' रतन ' को फिर याद आ गया, तेरे साथ का गुजरा जमाना,
न तू दिल से जाती है, याद तेरी, तेरी मूरत पे खत्म होती है//
राजीव रत्नेश
""""""""""""""""
मेरी दुनिया से दूर, आखिर जाओगी भी तो कहाँ?
तू मेरे सरमाये में है, याद करूँगा तेरी जुल्फ उलझने
तक/
राजीव रत्नेश
""""""""""""""''''''''"""""""""".
" दुनिया के सारे फलसफे , सारी किताबें पढ़ लीं रतन ने,
पर सुकून सिर्फ चंदा की सूरत पे ही आकर मुकम्मल हुआ//"
-------------------------

No comments:
Post a Comment