वो क्या जानें? ( कविता)
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( साकी के नाम)
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तेरी आरजू में आते हैं ऐ प्रिये!
तेरी महफिल में जाने कितने दीवाने?
कितने पर तुमको छू भी सके हैं,
ना कह कर हँस क्यूँ देती हो, वो क्या जानें?
सोचते सभी अभी चलेगा दौरे- जाम,
कहाँ वो प्याला, चंचल सबकी निगाहें?
स्पर्श करा कर प्याले का, उनके अधरों से,
हटा क्यूँ लेती हो, ऐ प्रिये! वो क्या जानें?
सुन-सुन कर मदहोश, तेरी नुपुर ध्वनि,
सुरूर चढ़ते उन पर कैसे अन्जाने?
थम जाती तुम्हारी थिरकन जब,
धड़कते क्यूँ उनके दिल, वो क्या जानें?
तन्हाई में रातों की मुझको ऐ नाजनी!
आते याद महफिल के मखमली गलीचे/
सजेगी तेरी महफिल, बजेगी फिर से,
तेरी पायल कब, ऐ प्रिये! वो क्या जानें?
छुप गया कहाँ आज मेरा चाँद?
पूछा सबसे, महफिल के जितने सितारे/
बरसेगी फिर चाँदनी कब तलक?
चमकेगा चाँद कब, ऐ प्रिये! वो क्या जानें?
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अशआर
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कहते हैं हुस्न जिसे, वो नाम है तुम्हारा,
कहते हैं इश्क जिसे, वो काम है तुम्हारा/
कहते हैं दाग- ए- चाँद, वह बिंदिया- ए- हसीना,
कहते हैं रोशनी जिसे, वो बाम है तुम्हारा/
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चर्चा हुई जब काली रात की जवानी का,
लोगों ने नाम लिया तुम्हारी बिंदिया काली का/
बात और भी बढ़ी, जब शम्मअ भी जली,
रोशनी में जिक्र हुआ, होठों की लाली का/
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भले ही हो मुहब्बत जिंदगी की रोशनी/
पर इस शय का दूसरा नाम है मजबूरी/
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मेरी महबूब! तू इतनी भोली भी नहीं कि,
उल्फत की बातों से भी तू बाखबर नहीं/
मुहब्बत को बना दिया तुमने तमाशा,
कहती हो, तुम्हें इसकी कुछ खबर नहीं//
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बहुत इंतजार के बाद आई है,
आज ये मस्तानी शाम,
दिल प्यासा है, पिला दे आज,
अपनी मस्त निगाहों का जाम/
मेरे दिल को जलाना ही रह,
गया है, आजकल तेरा काम,
तू क्या जाने, मेरी मजबूरियों का,
नाम है बस सनम तेरा नाम//
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ऐ सनम! नशे की बातों पे नजा,
न कर जमाने की बातों का एतबार/
मैं रंगीं दिल जरूर हूँ, पर बेवफा नहीं,
सिर्फ तुम्हीं से करता हूँ प्यार//
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ऐ सनम! करती होंगी तुम मेरा इंतजार,
क्या करूँ, बैठे हैं साथ मेरे, मेरे यार/
तुमसे मिलने की बात कहूँ उनसे कैसे?
बुरा न मान जाएँ कहीं मेरे अहबाब//
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वही बादा, वही मैरवाना,
अबभी है वही साकी/
मगर रह नहीं गई, पहले ,
सी वो लज्जत बाकी//
राजीव' रत्नेश'
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