तुमसे मुहब्बत करने की...!!! ( कविता)
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ऐ खूबसूरत सनम तेरी अदा जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
तेरे प्यार का ठिकाना नहीं, गैर भी हैं,
तू क्या है सनम, तेरी रजा जानता हूँ/
हकीकत जानता हूँ, मैं बदगुमान नहीं,
देगी दगा तू इश्क में, सरेआम यहीं,
माना तू अभी हमकदम है मेरे साथ- साथ,
जानता हूँ, साथ छोड़ जाएगी कहीं न कहीं/
कितने पानी में है तू, तेरी वफा जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
अभी तो मयकदे में लुत्फ है,
मेरे पैमाने में अब तक शराब है,
तेरे होंठों पे रंगत, मेरे पे प्यास है,
अभी तो आजा, तेरे बिना सब उदास है/
बिजली बन गिरेगी सर पे कजा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
मदहोश नहीं हूँ, अभी तो होश है बाकी,
हारा नहीं हूँ, अभी तो जोश है बाकी,
शमां जलती है, तू भी जल संग- संग,
अभी तो आलम मयनोश है साकी/
इक दिन तू बन जाएगी बला, जानता हूँ
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
लहराते हैं तेरी नीली साड़ी पे सितारे,
तू रहती है हर वक्त जुल्फें सँवारे,
आँखों में वफा की काजल दिखाती हो,
कहती है, रहूंगी बावफा, बिना सोचे विचारे/
इक दिन देगी तू मुझको दगा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
अभी तो बागों में बोलती है कोयल,
और मुरली की तान पर बजती है पायल,
गेसू तेरे बिखर जाते हैं थिरकन से,
रह- रह के ढ़ल जाता है तेरा आँचल/
चमन में आएगी इक दिन खिजा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
भले शायर की हर बात में असर हो,
उसके दिल की हर आह में असर हो,
साथ देने वाले भी हों, अपने भी हों,
बचपन भले रंगीनियों में हुआ बसर हो/
जवानी उसकी बन जाती है मयकदा, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ/
अभी तो तुम भी, पहलू मेरा आबाद करोगी,
मेरे हर शेर पे इरशाद कहोगी,
जबरदस्ती प्यार के बंधन में बँधोगी,
मेरी भरी जवानी तुम बरबाद करोगी/
इक दिन बता दोगी धता, जानता हूँ,
तुझसे मुहब्बत करने की सजा जानता हूँ//
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गुलदस्ता- ए- अशआर
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कभी तो ये दिल बहुत उदास होत है,
कभी दिल में रहती है खुशहाली,
सुबह को मिलती है उल्फत,
तो मेरी शाम रहती है प्यासी//
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यार तुम कैसे हो, तुम्हें बेवफा
तो न मैंने जाना था,
तुम्हें अपना नहीं, तो गैर भी
न मैंने जाना था/
हकीकत क्या है इश्क की
इससे तुम अनजान नहीं,
तुम निकले क्या, तुम क्या जानो
तुम्हें मैंने क्या जाना था//
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मेरे नजदीकी यार-दोस्तों में
तुम्हारी चर्चा है,
तुम कितनी हसीन हो
ये भी चर्चा है,
इक परवाना है और
इक शमां है,
लोग बाग की सुनो उन पे
तो कयामत बर्पा है//
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लोग कहते हैं मेरी शायरी में
खास बातें हैं,
जो कहते हैं और लोग
वो आम बातें हैं/
मेरी उल्टी-सीधी- तिरछी
बेपर की बातों पर,
हर बार कहते हैं वो
आप बजा फरमाते हैं//
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मुझे ऐ जाने- करार
तुम मेरी तकदीर लगती हो,
हर हाल में तुम मुझे
वफा की तस्वीर लगती होमुहब्बत की मंजिल को
पा लेने की,
ऐ सनम तुम मुझे
आसां तदबीर लगती हो//
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सोचता हूँ बहुत उदास है वो,
उल्फत की बातों से अन्जान है वो,
मेरी चाहत का हो असर उसपे कैसे,
अभी बहुत भोली, बहुत मासूम है वो//
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राजीव रत्नेश
1975 ई०
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/

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