होली ( कविता)
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खुदा करे होली यूँ ही,
रोज-रोज आती रहे/
मैं तुझे रंग लगाता रहूँ,
तू रंग छुड़ाती रहे//
गुलशन में बहार आई है,
हर कली आज मुस्कराई है,
कुछ न पूछो, भौरों के दिल में,
आज क्या आई है--
" देखो, चंद कलियाँ खिली हैं"
एक दूसरे को सुना रहा है,
जिसके जी में जो आता है,
वही वह गुनगुना रहा है/
उदास गुलों पर भी,
आज तो रौनक आई है,
देख कर फिजा को रंगीन,
नरगिस ने भी आँख झपकाई है/
जवान दिलों को देखो,
अब प्यार मचलने लगा है,
आज सड़कछाप हर दीवाना,
शीशे के सामने सँवरने लगा है/
आज तो करीब से बोलो,
न दूर से इशारा करो,
आज ही तो वक्त है,
कहने का बस इरादा करो/
जनाबों के गलों में पड़ी मालायें,
गुलाब के पहलू में जूही पड़ी है,
ये जो प्लेट लिए आईं हैं,
देखो तो, लगती फुलझड़ी हैं/
कहती हैं," देर न करो,
अब जल्दी से सफाया करो,
कभी ही तो मिलते हैं मौके,
कभी तो आँख मिलाया करो/
हँसने-हँसाने का वक्त है,
न तुम शरमाया करो,
कभी खाया करो किसी से,
तो कभी किसी को खिलाया करो"/
हर गली में, हर सड़क पर,
एक ही गीत बज रहा है,
हर हिन्दुस्तानी एक दूसरे से,
बन के भाई गले मिल रहा है/
कोई सलाम, कोई बंदगी,
कोई गुलाल मल रहा है,
कोई होके फाग में मस्त,
बयाने- अफसाना सुना रहा है/
कितनी भीड़ भरी हैं सड़कें,
कितनी जमाते साथ चल रही हैं,
दिल में आया तो साथ पकड़ा,
वरना कोई अकेला चल रहा है/
हर तरफ गौर से देखो,
मुकद्दर की सुबह आई है,
तमाम खैरात ले कर आज,
देखो कैसी होली आई है/
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अशआर
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दूर रह के पूछते हो हाल,
रकीब से भेजते हो पाती/
नजदीकी में यूँ शर्मा के रह गए,
मिला न सके छाती से छाती//
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मलते रहें लोग गुलाल कितना ही,
गाल तुम्हारा हो पाता नहीं लाल है/
लूटते हैं सब वाहवाही खुद- ब- खुद,
क्या कहें गाल की तुम्हारे क्या बात है//
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रंग पोत- पात के,
कोई गुझिया खिला जाएगा/
ये दिल ऐसे ही,
थोड़े ना बहल जाएगा//
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पिलाना फर्ज था,
कुछ तो पिलाया होता/
सागर नहीं था तो,
आँखों से पिलाया होता//
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कोई रंग लगाता रहा,
कोई हाथ धुलाता रहा/
हाथों से गुझिया औ' साथ में,
मय- ए- निगाह पिलाता रहा//
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बुरा न मानो होली है,
चढ़ी भले आज गोली है/
हम जिस पर लिख रहे हैं,
वह' चीज' तो सरकारी है//
राजीव रत्नेश
1975 ई०
इलाहाबाद
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