बहुत याद आईं तुम प्रिये! ( कविता)
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तुम आज भी मेला घूमने
नहीं गईं,
खिचड़ी का त्यौहार मनाया
भी तो फीका-फीका/
रोज की तरह दाल-रोटी
खाई,
रोज की तरह पानी पीया/
दही- चिउड़ा न खाया,
खिचड़ी न खाया,
आखिर कयूँ?
क्यूँ तुम उदास हो?
बस बँद करके दरवाजे,
घर में पड़ी हो/
न कहीं घूमी,
न टहली हो,
छुट्टी भी है,
आज तो,
सहेलियों संग बातें,
भी न की होंगी/
चुलबुल- चुलबुल
न की होगी,
फिर कैसे पचा
होगा पानी?
उदास होगा मौसम,
तड़पती होगी जवानी/
किसी आशिक ने
आवाज न कसी होगी,
किसी ने फब्ती न की होगी,
तुम्हें करार भी तो,
न मिला होगा/
रोज रहती हो खुश,
त्यौहार पे नाखुशी कैसी?
अपने दिलदार से नाराजगी कैसी?
मैं तो तुम सम,
उदास न था,
माफ कर देना,
तुम्हारे गम में न,
साझा कर सका/
यार आए थे,
चला गया साथ,
मनाने पिकनिक/
झूँसी के खंडहरों में,
बन में, बागों में घूमा,
बाँसुरी बजाई,
पानी में डुबकियाँ
लगाईं/
जाती हुई मिस माया
को आवाज लगाई,
बाबा को कहा,
' आओ गले लग जाओ'/
काश! तुम होती साथ,
तो तुमसे ही कहता,
वही बात,
भले तुम बुरा मान जाती,
करके अपनी अम्मी
का लिहाज/
देख कर जगत के
रीति-रिवाज,
होती शर्मिन्दा,
करती झूठा मान,
इसी कारन तो और भी,
तुमसे मिलने नहीं गया/
जानता था,
तुम तो न टालोगी,
पर तुम्हारी अम्मी,
टाल जाएँगी/
उस रोज भी तो,
टाल गईं थीं जब,
मैं आया था,
तुमको ले जाने के लिए,
पिकनिक में,
वहीं' मिन्टो पार्क' में/
तुम्हारा इरादा था,
मेरे साथ जाने का,
तुमने कहा था,
' अम्मी से कहिए'
मैंने कहा,
' मैं क्या कहूँ?
तुम ही पूछो ना'/
और तुम्हारी अम्मी ने,
बहाना बनाया था,
पिकचर जाने का,
वहीं' उत्तम' में,
" झील के उस पार"/
और तुम न गई,
पिकनिक में,
पर गई झील के उस पार/
मैं ' सावन- भादों ' का,
मजा लेता रहा/
तुमसे मिल कर खुश था,
जुदाई के गम में,
भादों मनाता रहा/
हंस के साथ,
हंसनी डोली,
याद तुम्हारी आई,
बहुत याद आई,
तुम प्रिये!
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अशआर
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तमाम पाबंदियाँ हैं, जान को जोखिमें हैं
एक मासूम दिल और हजार दास्तानें हैं
लोग इश्क की इक उल्टी बाजी को,
कहते हैं, लैला-मजनूं के माडर्न फसाने हैं//
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दस्तूर मुहब्बत का बदल दे सनम!
बदल गया है, लैला-मजनूं का फसाना
अब न वो शीरी रही और न फरहाद
मुहब्बत मशीनी हो गई, आ गया नया जमाना//
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तुम सोच लो, गरज पे हम नहीं जीते
भूल जाते हैं हर गम हम पीते-पिलाते
मुहब्बत की डगर पर चलते जाते हैं
बस किसी तरह गिरते- संभलते, मरते- जीते//
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दिलो- जां से मैं तुम्हें चाहता हूँ,
तुम्हारी खुशी, मुझे चाहो न चाहो
राजीव' रत्नेश'
1974 ई०
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद

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