बड़ी आई हँसी सुन कर....!!! ( कविता)
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बड़ी आई हँसी सुन कर,
दे रही हैं उनकी अम्मा भी इम्तहान/
अभी फुरसत नहीं है,
कारण?
कारण कि कल ही,
है इम्तहान/
अभी तैयार करना है कोर्स,
रात भर में पढ़ डालना है,
ये मोटा पोथा,
खत्म होगा बाद में,
इम्तहान/
कैसे जा सकता है कोई,
' अशोक बाबू' के यहाँ?
लाने को अपनी किताब,
कौ मधू ?
वो जाएगी कैसे,
बज रहे होंगे इस वक्त,
रात के आठ/
औ' रहता है गली में,
बिल्कुल अँधेरा,
औ' आस- पास घूमते,
रहते हैं आवारा, शैतान/
और उसको थी उत्तेजना,
वाह जी वाह जनाब!
मैं लड़की हूँ तो,
क्या इतनी डरती हूँ?
कि अँधियारों में कदम,
रखते हुए सिहरती हूँ?
दिखा देंगे हम भी,
हम औरत हैं तो क्या,
पर मर्दों से कम नहीं/
मौका पड़ा तो,
बन जाएँगे उनके हज्जाम/
मूड़ देंगे उल्टे छुरे से,
पता लगेगा तब,
औरत क्या है?
औरत की फितरत क्या है?
बड़ा हुआ हैरान देखकर,
कर रही हैं बात बेहिसाब ,
कल तक जो थीं बेजुबान,
बड़ी आई हँसी सुन कर,
दे रही हैं उनकी अम्मा भी इम्तहान/
फिर भी मिली न इजाजत,
जाने को बाहर,
इतनी रात गए,
अँधियारी गली से गुजरकर,
खुलवाया जाए मकाने- गैर,
इस पर बोल पड़ी तैश में,
न हो तो आप भी तो,
चल सकते हैं साथ में,
आप तो औरत नहीं,
आपको तो अँधेरों का डर नहीं,
काम आपको है,
किताब आपको चाहिए/
मुझसे क्या?
भले वो मेरी किताब हो,
जरूरत आपकी है,
गरज आपकी है/
मैं भी तो था तैयार,
जाने को साथ,
इससे बढ़िया.....
पर क्या करता,
एक आवाज सुनी,
बड़ी वैसी है,
लड़की यह,
जाएगी सरे- रात,
लाने किताब,
अगल-बगल, आस- पास,
अड़ोस-पड़ोस के लोग,
कहेंगे क्या?
सोचेंगे क्या?
और फिर ,
सुझाया ये गया,
किताब कल दिन में,
लाई जाय,
और फिर
' दिन के उजाले में',
मेरे हाथों में,
समर्पित की जाए/
यही होगा,
सरल विकल्प,
साँप का साँप भी मरेगा,
और नहीं टूटेगी लाठी भी/
बात सही भी थी,
युक्तिसंगत भी थी,
हर कोई तो सोचकर,
चलता है आगा-पीछा/
पर बात है, उनके जैसे,
कुछ लोग,
फिरते हैं,
अक्ल के पीछे लेकर लट्ठ,
तर्क पेश किया उन्होंने भी,
सरे-आम/
बड़ी आई हँसी सुन कर,
दे रही हैं उनकी अम्मा भी इम्तहान//
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गुलदस्ता- ए- अशसार
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क्लास में हूँ मगर
नजर बोर्ड पर नहीं,
पन्ने पलटता हूँ किताब के
मगर दिल वश में नहीं/
तुमने जाने यह कौन सा
रोग लगा दिया मुझको,
सबसे मिलता हूँ मगर
खुद का पता नहीं//
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मैं समझता हूँ तुम मुझसे
वफा निभाओ तो बात बुरी नहीं,
तकदीर रौशन हो तो कोई
शय होती है बुरी नहीं/
गर तुम खुद ही मेरी हमकदम
बन कर चलना चाहो,
प्यार में मजबूरियाँ भी मिलें
तो मेरे लिए बुरी नहीं//
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तुमको अपनी खुशियों के लिए
बहार समझता था,
तुम क्या थीं तुम्हें में
गुलनार समझता था/
जो थोड़ी सी बेवफाई
करती थीं तुम मुझसे,
तुम्हें मैं हरी मिर्च का
अचार समझता था//
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आप अपना दामन
बचाएँगे कब तक,
बताइए आँखों से
पिलाएँगे कब तक/
दिल से तरन्नुम उठेंगे
महफिल जगमगाएगी,
मैं आता तो हूँ रोज
आप शरमाएँगे कब तक//
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तू शम्मअ- ए- महफिल है
और मैं परवाना,
हर हाल में चाहता बस
तेरे हाथों से पैमाना/
आज तू पिला दे
आज तू होश भुला दे,
मैं लाऊँगा तेरे दर पर
मयखाने का मयखाना//
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सोचता हूँ शम्मअ पर
रहेगा पहरा कब तक,
आज तो पर्दा है
उठेगा नकाबे- चेहरा कब तक/
तुम फिर जगमगाओगी
झिलमिल सितारों से,
बनोगी दुल्हन कब
बँधेगा मेरे सेहरा कब तक//
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मुझे वफा की याद दिलाने
आई है तू तन्हाई में,
और मैं डूबा हूँ तिरी
आँखों की गहराई में/
मैंने होश भुलाने को
पी ली थी कुछ ज्यादा,
तू क्या जाने पिया था
बस तेरी जुदाई में//
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जमाने से जूझना भी जानता हूँ
रस्मो-रिवाज को तोड़ना भी जानता हूँ/
तुम दोगी साथ कि करोगी बेवफाई
तुम्हारी नस-नस मैं पहचानता हूँ//
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आप बैठे हैं महफिल में चुप
कैसे मेरे दिल को करार आए
आपकी निगाहें हैं गैर के रुख पे
कैसे मेरी जुबां पे बात आए//
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जमाने की बदली निगाह
चुभाती है नश्तर
आपरेशन के लिए तैय्यार
बेड पे पड़े मरीज के लिए
जैसे एन्थेशेशिया का इंजेक्शन//
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थकित पाँव
दुखित मन
कितनी पीड़ाओं का दर्द
अंतस मे अंतर्द्वन्द
क्या जिन्दगी
इतने में ही है
सीमाबद्ध!
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जिन्दगी का बियाबां
सिमटे नज्म
मेरी मौतों की फेहरिस्त
आजार जिस्त!
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राजीव' रत्नेश'
1974 ई०
मुठ्ठीगंज इलाहाबाद/

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