Wednesday, January 21, 2026

ये रात झूठी लगती है !!! ( कविता

ये रात झूठी लगती है   !!!  ( कविता)
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अभी तुम मेरे पहलू में थी ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

तुम दिल से रंगीं थीं, नशे में चूर थीं
तुम्हारी शरारती नजरों में मस्ती- ए- शराब भरपूर थी
मैं पीता चला गया होकर मदहोश, ख्याल न था
क्या करता ख्याल, तेरी हर अदा पुरनूर थी

तुमने दिया था पीने को, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

मैं वो शायर नहीं जो तेरी याद को दर्द बना कर
फिर दर्द भुलाने को आबाद करता है मयखाना
मैं तो जानता हूँ राजे- उल्फत, ये इश्क- ओ- वफा क्या 
                                                                         है
शमां तो होती है बेवफा, क्यूँ जलता है परवाना

अपनी दिलरुबा- ओ- महबूब की जात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगता है

ये उल्फत कुछ हद से गुजरी है कि पहचानी नहीं जाती
मेरी ताज दुनिया की भीड़ में, अब पहचानी नहीं जाती
मैं कोई वंशीधर भी नहीं कि तान से बुला लूँ तुमको
क्या बताऊँ मुश्किल तो ये है कि कुछ कही नहीं जाती

मैं आश्ना- ए- मुहब्बत हूँ, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

वो तेरे रेशम से लहराते- फहराते कंधे पे झूलते भूरे  
                                                                   बाल
ये नाशपाती से लाल, सेब जैसे तेरे फूले-फूले गाल
आँखों में तेरे मस्ती, जैसे कजा खेल रही हो
बाहों के बंधन में रखी थी अपनी अमानत संभाल

ये अमानत मेरे लिए है, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

तेरी नीली साड़ी के प्रिये, चमचमाते थे सितारे
खुशबू- ए- पैकर अजीब थी, जुल्फें थीं तुम सँवारे
मेरी बाहों में आ समाई थी, या मैंने बाँधा था बंधन
कुछ यूँ बेताब हुआ दिल, तुमने जो किये इशारे

वो इशारा मेरे लिए था, ये बात झूठी लगती है
ये रात अभी जवान थी, ये रात झूठी लगती है

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अशआर
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आज ये चाँद भी शरमाया कयूँ है मुझसे
घूँघट से अपने चेहरे को छुपाया क्यूँ है मुझसे
अरे यार आए हैं, तो क्या फर्क पड़ता है
बेवजह ही दिलदार मेरा, घबराया कयूँ है मुझसे?
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समझने के लिए ये अंदाज ही काफी है
दिल के धड़कने को ये राज ही काफी है
न समझो यूँ गैर, ये' रत्न' तुम्हारा है
मुझको बुलाने को तुम्हारी आवाज काफी है//
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दास्तां गम की चली तो बात आँसुओं तक पहुंची
जिक्र हुआ थामने को हाथ तो बात कमजोर बाजुओं
                                                          तक पहुंची
जिन्दगी मेरी यूँ वीरान क्यूँ हो गई, पूछा ये गया
बात बढ़ी तो मेरी नाकाम आरजुओं तक पहुंची//

                  राजीव' रत्नेश'
                     1974 ई०
                    मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद

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