तुम भी बेवफा हो...!!! ( कविता)
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तुम भी बेवफा हो,
ठीक इसी धरती की तरह,
सुबह को विहँसती है,
पाकर सूरज का साथ,
शाम आई तो भूल जाती है,
हर वफा, हर वादा/
और लेती है बसेरा,
चाँद के आगोश में,
और रहती है,
खामोश सी,
क्यूँकि------
प्यार की असली भाषा तो,
रात के अँधेरों में,
चाँदनी की बारातों में,
जरा कुछ ठीक से पढ़ी जाती है/
दिन में तो रहते हैं तमाम झंझट,
भला है यह भी कोई वक्त,
दिन में चलना,
प्यार की दुनिया,
बसाए हुए,
सीने में किसी का गम,
छिपाए हुए/
खेलना है बस मौत से,
जीवन भूलना है,
और पार करना अग्नि की रेखा है/
सैकड़ों दिल मचला करते हैं यूँ ही,
हर जगह पर लगी लक्ष्मण-रेखा है/
ये रेखा भी पार की जा सकती है,
पर बड़ी बेवफा अग्नि- रेखा है/
इसीलिए तो हमें भी,
वक्त का भरोसा करना पड़ा,
बस अँधेरों में रह कर,
दूर की रोशनी से,
गुजारा करना पड़ा/
हाँ मंजिल की रोशनी भी,
नजर आएगी यूँ ही दूर से,
पास पहुँचने पर केवल,
पर्दा नजर आएगा/
इसी पर्दे से बहुत कुछ बनता है,
किसी का आँचल,
किसी का घूँघट,
किसी का बुर्का,
और उसमें सिमटा रहता है,
चाँद सा चेहरा/
एक पर्दा तो होता ही है,
उस पर भी रहता है,
जमाने का पहरा/
सब कुछ बाबत वक्त का है,
ये वक्त न आता तो हम भी,
अग्नि- रेखा से उलझते/
पाँच- पचासी की जगह,
पत्ता दस का खर्च करते/
उसी से तो खुशी है,
उसी से रोशनी है,
महफिल में/
नहीं तो फिर कौन पूछता,
सिर्फ हाल को,
मैनेजर को या,
गेटकीपर फटेहाल को/
मैंने भी बहुत सदमे उठाए,
अपनी जान की खातिर,
पर वो भी बन जाती है,
बेवफा हर बार,
बेवफा धरती की तरह/
जो हर किसी को जन्म देती है,
खिलाती है, पिलाती है,
तन्दुरुस्त बनाती है,
जिंदगी की तमाम खुशियाँ,
और गम सौंप कर,
एक दिन धूल में मिला देती है,
मौत की आगोश में पहुँचा देती है/
मुस्लिम को दफ्न तो,
हिन्दू को चिता पे सुला देती है/
यह भी कोई वफा है?
यह भी कोई दस्तूर है?
जिस गले को सराहा कभी,
उसी में फंदा लगा देती है,
बिल्कुल बेवफा की तरह,
पेश आती है/
आखिर में बचती है क्या?
तन्हाई की तड़प,
मौत की सिसकन,
लोग सोचते होंगे,
अमुक ब्रह्मांड में,
लीन हो गया होगा,
नहीं तो ईश्वर से,
साक्षात्कार हो गया होगा,
मिल तो गई होगी,
मंजिल जरूर ही,
नहीं तो चौरासी लाख,
योनियों में भटक रहा होगा,
वाकई! तथ्य तो सोचते हैं सब यही,
दर्शन यही है, तत्व और सार यही है,
मगर, मुहब्बत के बारे में,
कोई नहीं कहता/
मैं कहता हूँ,
मिटने के बाद अमुक,
अपनी प्रिया से मिला होगा,
जमाने का गिला,
अपनी गुजरी सुना रहा होगा/
ब्रह्मांड की हकीकत यही है,
मुहब्बत की दुनिया यही है/
इसीलिए तो ऋषिकपूर,
डिम्पल को पहाड़ की चोटी से,
कुदाने ले गया,
उसी झील में,
प्राण और प्रेमनाथ ने,
न बचाया होता,
तो यह ब्रह्मांड मिला देता/
पृथ्वी तो दगाबाज है,
मिलन नहीं देख सकती,
रोड़े अटकाती है,
सिर्फ तनो- बदन में,
आग लगाती है,
वफा निभाता है तो,
यही ब्रह्मांड/
इसीलिए तो कहता हूँ,
आओ, हम- तुम,
आत्म-हत्या कर लें//
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गुलदस्ता- ए- अशआर
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तुम्हारी नजर मेरे लिए पैगाम बन गई है,
तुम्हारी आँख मेरे लिए जुबान बन गई है/
तुम खफा होकर, यूँ दूर होकर जाओगी कहाँ?
तुम्हारी याद मेरे लिए जाम बन गई है//
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मेरी चाय के प्याले से,
उठता धुँए का गुबार,
जैसे एक हसीना के,
होंठों पे खिलता गुलाब,
मुझे एक नशे में डूब,
जाने के लिए मदहोश करता है,
ठीक वैसे ही जैसे,
कभी- कभी तुम्हारा शबाब//
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तुम्हें अपना यकीं दिलाऊँ क्यूँकर,
तुम्हें अपनी आज बताऊँ क्यूँकर,
तुम्हारी आँखों में सनम वो वफा नहीं है,
तुम्हीं बोलो, तुम्हें शायरी सुनाऊँ क्यूँकर//
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क्या- क्या हैं ये नाजो- अंदाज,
क्या प्यार भरी हैं, बातें तुम्हारी,
यूँ न देखो सनम स्निग्ध निगाहों से,
कहीं बदल न जाएँ निगाहें हमारी//
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यहाँ रहते हैं मुहब्बत में मरने-जीने वाले,
यह मुंगेर नहीं है, रहते हैं यहाँ सीने वाले/
संभल के पिलाओ सनम जामे- निगाह,
पैमाना तक पी जाते हैं यहाँ, पीने वाले//
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लगता है,
तुम हो एक टेप रिकार्ड,
जो आया, जिसने चाहा,
घुमा दिया स्वीच,
बढ़ा दिया वाल्यूम,
और सुन लिया,
लता मंगेशकर की आवाज में,
' तुमसे है हर खुशी अपनी' //
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कभी भूले से ही नजरे- करम
इधर कर देना,
सदा तिरछी नजर से देखने वाले,
कभी सीधी नजर कर देना,
सिर्फ उम्मीदों से ही न तसल्ली,
देते रहना दिल को,
आने को हो जब, कासिद,
से ही खबर कर देना//
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अब तो ये मुहब्बत भी,
बदनान हो जाएगी,
तुमसे मिलने की उम्मीद,
जो नाकाम हो जाएगी,
मानता हूँ इकरार तेरा,
केवल झूठी तसल्ली नहीं,
मगर जब तक तू आएगी,
सनम उम्र तमाम हो जाएगी//
राजीव ' रत्नेश'
1972

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