काश! मेरे तुम मेहमान न होते...!!! ( कविता)
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काश! मेरे तुम मेहमान न होते,
औ' बंधन में मेरे मन- प्रान न होते/
तुम यूँ कुछ कह देते, औ' मैं सुन लेता,
सुन लेता,
फिर कुछ न कहता,
ये बात तो न होती,
कुछ होता जरूर,
मेरी ओर से खामोशी
ऐसी अख्तियार न होती/
तुम्हारा क्या,
तुम हो बड़े लोग,
और आए हो बड़ी दूर से,
गौरमिंट की जीप में/
गरीबों के पैसे से,
प्राप्त की गई,
बनारसी साड़ी ,
मुझको दिखाते हो/
ये ऐशो- तरब में,
गुजरी जिन्दगानी,
कितनों को पिला-पिला,
के पानी पाई है खानी,
खा-खा के पराया माल,
बनाई है ये जवानी/
और गुरुर है जिसका,
बनाई है, उठाई है,
पोजीशन,
हराम के माल से,
उठाया है फायदा,
लोगों के बवाल से,
खुद तो खाया है,
मुझे भी खिलाते हो,
घूस का चंदा/
मुझसे भी चलवाना
चाहते हो अपना धंधा/
मैं कर देता भंडाफोड़,
बिठाल देता तुम्हारा धंधा/
काश मेरे तुम मेहमान न होते,
औ' बंधन में मेरे मन प्रान न होते/
कहीं तो अपनापन जतलाते हो,
कहीं पर अहसासे- गैर दिखाते हो,
कभी किया था एहसान,
जबरदस्ती खिला के अपना नमक,
वैसे भी सब्जी में मिर्च झोंक दिया था,
फ्लैट में अपने घुमाया था,
दिखाने को अपनी चमक-दमक,
गैरों से हँसे थे, बोले थे तुम,
सिर्फ जलाने को किसी को,
किसी का शायद दिल/
दिखा कर किसी को दबाई थी,
तुमने अपनी बाईं आँख/
बातों ही बातों में खिला दिया था,
प्यार का भात,
अकेले में ले जाकर,
धुलाया था हाथ/
पूछा था,' खाना कैसा था?
( वैसे जिससे पूछा था,
हराम का मिल जाय तो खा जाय जहर)
वो नादां था,
बोल दिया था रखने को,
तुम्हारा दिल,
' वाकई! सब बड़ा बढ़िया था'/
वैसे नौकरों की बनाई बिरयानी से,
अपनी माँ के हाथों की बनाई,
रोटी और चटनी ही मुझे सुहाती है,
तुम्हारे मखमली सोफे से,
अपने घर की चटाई अच्छी लगती है/
मैं होता तो निश्चित था,
यही कहता,
' बड़ा बेकार था खाना,
बोर थी सब्जी,
नमक और मिर्च,
झोंक दिया था,
दाल में लहसुन की जगह,
साबुन का छोंक दिया था/
इतने साल से सीखते रहे,
बनाना तुम खाना,
पर न आया अब तक,
बनाना तुम्हें खाना'/
वहाँ पर भी बात वही थी,
यहाँ तुम मेहमान हो मेरे,
वहाँ मैं मेहमान था तुम्हारा/
बात यही है,
सही भी यही है/
मैं जरूर देता तुम्हारी,
बात का जवाब,
भले ही कुम्हला जाता,
तुम्हारा मस्त शबाब,
तुम रूठ कर चल देते,
बिना खाए डिनर,
बिना पिए पानी,
लोगों से मेरी शिकायत,
करते न करते,
मैं भी उसी तरह का,
कुछ....
काश! मेरे तुम मेहमान न होते,
और बंधन में मेरे मन- प्रान न होते//
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अशआर
""""""""
गनीमत है दुनिया में तब तक ही,
जब तक कोई किसी का मेहमान न हो/
छेड़ने की इजाजत है, उस दिल को ही,
जख्म खाया जो इक चट्टान न हो//
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जब-जब तुमने मुझे बरबाद किया,
हर हाल में तुम्हें मैंने इरशाद किया,
सदियों बाद जो रहे- गुमराह से लौटे,
फिर भी वफा का मैंने इकरार किया//
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माना उन्होंने तो नजरों से वार किया,
भले अकेले में जी भर कर प्यार किया,
बन गए ऐन वक्त पर दुश्मन वो मेरे,
तुमने भी तो कलेजा ही मेरा चाक किया//
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तुमने मुझे दोस्त कहा मैंने माना,
तुमने मुझे दिलदार कहा, मैंने जाना,
मौन का अर्थ लगाया मेरी बेरुखी,
बनोगी बेवफा तुम, मैंने पहचाना//
राजीव' रत्नेश'
1972 ई०
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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