उम्मीदे- वफा करूँ क्यूँकर? ( कविता)
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सोचता हूँ, तुमसे
उम्मीदे- वफा करूँ क्यूँकर/
तुम्हें अपना समझूँ,
और तुम वफा न निभाओ,
तो फिर तुम्हें दूँ सजा क्यूँकर?
मैंने देखी थी, तुम्हारी वो अदा,
लोगों की भीड़-भाड़ में,
रोशनी के ताम-झाम में,
चंद मेरे चंद तुम्हारे,
लोगों के दरम्यान में,
वो दिल पे लगी चोट से,
तुम्हारा तिलमिलाना/
और फिर मुझसे बेरुखी,
दिखाने को रूठना-मचलना/
मेरी किसी से बातों पर,
वो तुम्हारा मुँह फिरा के,
दूसरी ओर निहारना/
और कारण?
कारण तो साफ था,
बस इतना ही राज था/
किसी ने दिया था,
फूल मुझे एक,
लाकर शायद किसी,
क्यारी से,
और मैंने ले लिया था उसे,
अपनी मजबूरी या लाचारी से/
फिर सोचा- समझा,
तो ये ख्याल आया मुझको,
अन्जाने में ये तो,
मुझपे एहसान हो गया/
सच कहता हूँ,
तुम्हारी याद आने से,
खुद पशेमान हो गया/
हैरान हो गया,
बिल्कुल बेजुबान हो गया/
और अपनी तो ये आदत
ही रही है,
जिसने एक भेंट दिया है,
उसे दुगुना भेंट किया है,
जिसने एक फूल दिया है,
उसे दो फूल दिया है/
और इसी बात को,
रख के मद्देनजर,
मैंने गुलाबी गुलाबों का,
पेयर उसे भेंट कर दिया था/
इस तमन्ना के साथ कि,
शायद ये दोनों गुलाब,
उसके दोनों आरिजों की,
सुर्खी चुरा लें/
और फिर वे,
हमेशा-हमेशा के लिए,
रौनक शुआर रहें/
नहीं तो कहाँ कोई गुल,
डाली का साथ,
छोड़ने के बाद,
दम नहीं तोड़ देता है/
नहीं तो यूँ ही कुम्हलाया- कुम्हलाया,
सा रहता है,
कहीं हो भी जाए,
पानी का साथ,
तो कुछ देर को विहंसा,
फिर वीरानियों में ही,
अँधेरों के दायरे में ही,
मिट्टी में,
दफ्न हो जाता है,
बिल्कुल कब्रगाह में,
गड़े एक मुर्दे की तरह/
और तुम मान गईं थीं बुरा,
वो देखी थी मै मैंने,
तुम्हारी मुँह फिराने की अदा,
तुम्हारे माथे पे थी शिकन,
निगाहों में थी थकन,
परास्त भाव की/
पर बात वो नहीं थी,
न तुमने पूछा ही मुझसे,
न मैंने ही कुछ बतलाया,
जो कुछ समझा,
जो कुछ देखा,
वो इशारों से,
उल्टी-सीधी वारदातों से,
ही तुम्हें जतलाया/
मगर तुमने ऐतबार न किया,
दिया था ' मैडम बम्बइया' को,
खाने को एक जोड़ा पान/
उसका भी तो यही राज था,
कभी किसी यूँ ही,
शादी- बारात के मौके के
दरम्यान,
उन्होंने मुझ पे,
किया था एहसान,
खिला कर एक बीड़ा पान/
खैर.....
तुमने ठान ही लिया,
जलाने को दिल मेरा/
वैसे मेरा कसूर,
शायद कुछ भी नहीं था/
वो किसी गैर को देखना,
मुझको दिखा-दिखा कर,
मेरे करीब आने से,
बढ़ना दामन बचा- बचा कर/
वो सब क्या नहीं थी
तुम्हारी अदा?
अपने जाने में क्या,
नहीं थी मेरी सजा?
और तुम तब भी,
रुक न सकीं,
जब दी मैंने तुमको,
तुम्हारे जाते-जाते सदा/
मुझे आई थी हँसी,
तुम्हारी हरकतों पर,
ये सोच के ही मैंने,
तुमसे किनार किया,
कि चलो अच्छा हुआ,
कम से कम अपना दिल,
तो अब फिर से हमारा हुआ/
फिर भी शिकनें उभरीं,
सलवटें पड़ीं,
तुम्हारी पेशानी पर/
जब मैंने तुम्हारी आहट पर,
तुम्हारी शरमाहट पर,
नजर तक न फेरी,
तुम ठिठकीं, मुस्कराईं,
और फिर,
उपेक्षाभाव से,
घुस गईं दुल्हन के कमरे में/
और एक तस्वीर सी उभरी,
मेरे जेहन के कैमरे में,
वो तुम्हारी बेवफाई की पोज,
मैं सोचने लगा,
कैसी तुम्हारी दोस्ती,
और कैसी ये वफा की खोज?
सभी कुछ तो नश्वर है,
इस दुनिया- ए- फानी में,
शाश्वत शायद कुछ भी नहीं,
इस थोड़ी सी जिन्दगानी में/
इससे पेशतर कि,
तुम बेवफा बनो,
बेहतर तो यही है,
मैं ही गुमराहे- राहे- वफा बनूँ/
सुकूने दिल है यही,
मंजिल है यही,
यही सोच कर,
न तुम्हारा दीदार किया,
रहीं कोशिशें भी,
नाकाम तुम्हारी,
न मिला ही तुमसे,
औ' न पर्दाफाश- ए- राज किया/
जानता था क्यूँकि,
तुम लोगों का एतबार,
हासिल करना,
मुश्किल होता है बड़ा/
ये वफा की डगर,
प्यार की मंजिल,
चंद मुलाकातों के उसूल पर,
अधिक दिन टिक नहीं सकती/
और तुम्हें इन्हीं,
खौफनाक ख्यालों में,
उलझा हुआ,
दूर चले जाने दिया/
मिलने भी न आ सका,
जाते-जाते तुमसे,
सिर्फ ये सोच कर,
जो खत्म हो गई है चीज,
उसे अब बढ़ाना नहीं है/
एक बार फुँक चुका है,
आशियाना जो,
उसे दुबारा दियासलाई,
दिखाना नहीं है,
इसीलिए तो तुमसे कहता हूँ,
तुमसे उम्मीदे- वफा करूँ क्यूँकर?
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अशआर
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मुझसे भी खुश नसीब तो
लाखों होंगे महफिल में/
पर कद्रदां- ए- हुस्न,
मुझसे ज्यादा नहीं//
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उनसे बीसियों झगड़े कौन खड़े करे,
जिनको गरज हो वही लड़ा करें,
जिनको मयस्सर न हो टेरीकाट,
वही कफन के लिए लड़ा करें//
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लोगों ने उनको शाहजादी- ए- महफिल कहा
और हमने उनको हजारों की कातिल कहा
उन्होंने बीच भँवर में जो हाथ अपना छुड़ा लिया
फिर भी उनके आँचल को हमने साहिल कहा//
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लोग अपने को कहते हैं शरीफ
और हमें बताते हैं वो दीवाना
उन्हें क्या मालूम, शराफत क्या बला
शराफत का वो जानते नहीं पैमाना//
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भोली, मासूम तुम्हारी आँखों से नहीं हुई
कुछ रोज से एक राज, एक गुफ्तगूं की बातें
बड़ा कठिन है एक दीदार भी तुम्हारा,
लगता खत्म हो जाएँगी मुहब्बतों की बातें//
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तुम्हारे सिवा नहीं चाहता किसी को
तुम भी न चाहो मेरे सिवा किसी को
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राजीव" रत्नेश"
1974 ई०
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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