Thursday, January 22, 2026

तेरी सूरत पे ( गजल)

तेरी सूरत पे ( गजल)
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तेरी सूरत पे इक रोज,
गुजरे वक्त की परछाइयाँ होंगी,
और मेरे दामन में सिमटी सी,
तेरी अँगड़ाइयाँ होंगी/

जहनों में रोशनी होगी,
यकीं की बारात साथ होगी,
मगर मेरे दिल को अख्तियार,
तमाम खामोशियाँ होंगी/

समंदर किनारे से लौटेंगी,
मौजें टकरा-टकरा कर,
कहीं न कोई साहिल, मस्तूल,
न कश्तियाँ होंगी/

मेरी जिन्दगी की विरासत,
तेरे गम की कायनात होगी,
साथ में मेरे, जमाने भर की,
फिकरो- फब्तियाँ होंगी/

महसूस जो अब है, गए वक्त की,
तिजारत फिर ये न होगी,
महफूज आज जो, मेरे दम से है,
कल न वो हस्तियाँ होंगी/

कल उम्मीदों के महले- दुमहले,
बन जाएँगे हर कहीं,
कहीं न अब सी टिमटिमाती,
जगमगाती बस्तियाँ होंगी/

इसी से दौरे- इश्क खुद को,
आजमा भी ले' रतन',
उल्फत को उल्फत की तरह जी,
कल न ये मस्तियाँ होंगी//

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रात भर बदन खुशबुओं से
                  माहेत्तर रहा,
कली एक घड़ी भर को,
                 बाहों में शरमाई थी//

           राजीव रत्नेश
            1970 ई०
           वाराणसी
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