तेरी सूरत पे ( गजल)
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तेरी सूरत पे इक रोज,
गुजरे वक्त की परछाइयाँ होंगी,
और मेरे दामन में सिमटी सी,
तेरी अँगड़ाइयाँ होंगी/
जहनों में रोशनी होगी,
यकीं की बारात साथ होगी,
मगर मेरे दिल को अख्तियार,
तमाम खामोशियाँ होंगी/
समंदर किनारे से लौटेंगी,
मौजें टकरा-टकरा कर,
कहीं न कोई साहिल, मस्तूल,
न कश्तियाँ होंगी/
मेरी जिन्दगी की विरासत,
तेरे गम की कायनात होगी,
साथ में मेरे, जमाने भर की,
फिकरो- फब्तियाँ होंगी/
महसूस जो अब है, गए वक्त की,
तिजारत फिर ये न होगी,
महफूज आज जो, मेरे दम से है,
कल न वो हस्तियाँ होंगी/
कल उम्मीदों के महले- दुमहले,
बन जाएँगे हर कहीं,
कहीं न अब सी टिमटिमाती,
जगमगाती बस्तियाँ होंगी/
इसी से दौरे- इश्क खुद को,
आजमा भी ले' रतन',
उल्फत को उल्फत की तरह जी,
कल न ये मस्तियाँ होंगी//
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रात भर बदन खुशबुओं से
माहेत्तर रहा,
कली एक घड़ी भर को,
बाहों में शरमाई थी//
राजीव रत्नेश
1970 ई०
वाराणसी
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