गंगा- तट की शाम !!! ( कविता)
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देखो एक पुलकित सी शाम,
लाली का आवरण लिए,
चली आ रही है/
और इस धुंधलके में,
नावों की जमघट में,
तुम एक नाव में,
बिल्कुल मेरे समीप हो/
देखो माझी के होंठों पर,
हल्की सी मुस्कान,
फिसल रही है/
देखो एक पुलकित सी शाम,
लाली का आवरण लिए,
चली आ रही है/
नीले आस्मां पर उड़ता हुआ,
परिदों का कारवां देखो,
हरी-हरी वादियों में,
चरिंदों का करिश्मा देखो,
वो देखो फिजा की खामोशी,
एक गीत गुनगुनाए,
चली आ रही है/
देखो एक हुलसित सी शाम,
लाली का आवरण लिए,
चली आ रही है/
देखो इंसान हैं वो,
लगते हैं जो दूर से साये,
उस पार नजर आते हैं,
जो टीले, वो हैं चौपाये,
बस बात यही है,
रात घिरती चली आ रही है,
देखो एक हुलसित सी शाम,
लाली का आवरण लिए,
चली आ रही है/
मंदिर, मस्जिद और ये गुरुद्वारे,
देखो लगते कितने पहचाने,
रहते हैं कभी मतभेद कितने,
आ जाते करीब कभी,
जाने- अनजाने/
वो देखो, कोई पुजारन,
थाल सजाए चली आ रही है,
देखो एक पुलकित सी शाम,
लाली का आवरण लिए,
चली आ रही है/
वो देखो, चंचल लहरों में,
दिखती मछलियाँ बहुरंगी,
ढलते सूरज की किरनों में,
नीली लहर लगती सतरंगी,
प्रकट प्रकृति की अनुपम शोभा,
कवि को मूक आमंत्रण दे रही है,
देखो एक पुलकित सी शाम,
लाली का आवरण लिए,
चली आ रही है//
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अशआर
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तुम्हारी मख्मूर निगाहों ने,
इक राज मुझसे कह दिया/
जो बातों से न कह सकी,
तुम्हारी आँखों ने कह दिया/
तुम एक गुलाबी कँवल हो,
आरिजों ने कह दिया,
तुम एक उमड़ती घटा हो,
तुम्हारी जुल्फों ने कह दिया//
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यह महकशी की फिजा है,
चलो साथ घूमें,
ये दिल की लगी है सनम!
चलो साथ घूमें,
बहुत मिलेंगे मौके फिर,
आराम करने को,
आज तो कुछ और बात है,
चलो साथ घूमें//
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राजीव रत्नेश
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