कहीं कल गुम न हो जाए-- यही सोच,
इसे लिखने में समय लगाया/
अपनी आराध्य- देवी के मनोहारी वर्शनों में खोया रहा,
जब चेतना लौटी तो इतना ही समझ आया------
शायद यूँ ही समय गँवाया/
फिर मन ने धीरे से मुस्करा कर कहा-------
जो भाव सच्चे हैं, वे कहाँ मिटते हैं,
स्मृतियों से उन्हें जगाया/
यदि एक भी हृदय उन्हें अपने भीतर स्थान दे दे,
तो कोई भी अभिव्यक्ति कभी गुम नहीं होती---
ऐसा तेरे मन ने मेरे मन को समझाया/
तुम्हारे आँगन में कल की खिली कली आज सिमट जाती है/
या कुछ यादें समय की धूल से आप ही आप अट जाती है/
मुझे लगता है, सब कुछ पाने की जहमत उठाने के बाद भी,
कभी- कभी अपनी ही मंजिल जाने कहाँ स्वयं खो जाती है/
मजबूरियाँ इंसान को कहाँ-कहाँ से नहीं तोड़ के रख देती हैं,
हँसती हुई हसीन आँखो में भी कुछ-कुछ नमी छोड़ जाती हैं/
जिन्दगी भी अजीब खेल खेल जाती है कभी- कभी मेरे साथ,
जीती हुई बाजी भी अपने ही हाथों खुद-ब-खुद हार जाती है/
फिर भी उम्मीद का एक दीप अपने दिल में जलाए रखना ' रतन ',
क्योंकि टूटी हुई, टेढ़ी-मेढ़ी राहों से भी सुबह निकल आती है/.
राजीव रत्नेश
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