मिलते थे जहाँ गंगा तट पर हम सुबह हो या शाम
जाते बघाड़ा और त्रिवेणी का देखने जल भराव
आता जब जब हमारे शहर में उमड़ कर सैलाब
चंदन घिसते पंडित जी बैठे रहते अपनी तोंद संभाल
पूजा अर्चना होती तट पर मनमंदिर के बजते घंटे घड़ियाल
खुरदुरी फिजां से ढँढ़ते मौके पाने को निजात
रहती थी मन में सदा नर्म हवाओं की तलाश
पैरों से समेट कर पानी में उतरते भींग जाते ललनाओं के लिबास
देखने जाते थे जबजब जलमग्न हो जाते लेटे हनुमान
छोड़कर अपना शहर आ गए दिल्ली दरबार
आज भी रतन को बुलाता इलाहाबाद का आवास

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