Monday, May 26, 2025

गजल - कहाँ सोचा था

महफिल में उसकी हर बात पे सजा
लब खामोश थे राह रोके थी हया

कुछ तो बात न थी हमारे दरम्याँ
किस कदर उठा लिया सर पे आस्मां

नवाजिशो खैर कम करते न बना हमसे
दूर होते गए वो हम देते रहे सदा

पर्दगी पर्दगी में हर कोई मारा गया
बेशऊरी ने उसकी कर दिया सबको उरियाँ

पहले नहीं था वो मिसाले नकहते जां
बन सका न कभी वो अच्छा राजदां

तीरेनजर से ही सबको कर गया घायल
असलहे थे उसके पास और भी जमा

कोई बात न थी फिर भी सबको पता
फिगारे चमन क्या था क्या था मर्तबा

चिलचिलाती धूप में निकल आया घर से
बस्ती मेरी थी साथ था बाप उसका

ये नहीं कि नजर उसकी मेहरबां न थी
तवील इतनी मेरी दास्तां सुनाते गुजरता अर्सा

कुछ तो बात है जो चुप लगाए बैठा है
खामोश होने वाली न थी उसकी जबां

मोहब्बत गालों पे निशान छोड़ते बही थी
बेनिशां कभी न थी मेरी अर्जेदास्तां

नतीजा कुछ न निकला हो गया अलविदा
राब्ता हमसे भी न था हो गया खुद ही जुदा

एक टीस सी थी दिल में वो रह गई है
वरना सब कुछ हमने कर दिया है बयां

गफलत में हाथों से उठा लिया जाम
कहाँ सोचा था इसमें होता है नशा

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