प्यार में तड़पती रहोगी खुद ही
नजरें झुका के सामने से गुजर जाती हो
मेरी याद तुम कभी भुला न पाओगी
गंगा जमना न होगी संगम न होगा
नमकीन पानी होगा वहाँ समंदर होगा
साथ निभाने वाला प्यार न मिलेगा
छोड़ मेरा शहर जो महानगर जाओगी
मत करो जोरा जोरी जंगल में
याद तुम्हारी हमें भी तो सताएगी
पिंजरा खोल कबूतरों को कर आजाद
दिल की आग अब जुबां तक आएगी
बना न मुझसे तू अब कोई बहाना
सय्याद ने किया पंछी हवाले तूफान
अब तो कर ले मुहब्बत का इकरार
मेरे आगे तेरी दाल न गल पाएगी
नसीहतें और अब दे न मुझको
कब तक और सताएगी
बीच मँझधार छोड़ा है साथ
टूटी किश्ती कहाँ तक साथ निभाएगी
नथा मजबूर तूने किया मुझे मजबूर
नजरों का वार तेरा हो गया बर्बाद
न बहला अपनी उल्टी सीधी बातों से
रतन को अब न तू समझा पाएगी

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