Monday, May 26, 2025

कविता - क्या मिलेगा कल पे टाल के

साकिया शराब दे
नूर ए माहताब दे
आकर चमन में
बादए नौबहार दे
भूल जा शिकवे गिले
जुल्फों की बयार हे

वार तेरा न भूलँगा
नजरों की कटार दे
खोल दे पिंजरा
कबूतरों को कर आजाद दे
अता मुझे मेरा हक कर
खुद पे अधिकार दे

चुलबुलाती आँखों की मस्ती
सुर्ख होठों की शोखी
दिले पारसा की निशानी
मयखाना अपना कर मेरे नाम पे
दिल को करार दे
मयखाने का हिसाब दे

जीवन में नया उल्लास दे
प्याला भर लबरेज रोमांस दे
कुछ खुशियाँ एडवांस दे
एहसास में रात ढ़ाल के
रतन को अपना ख्याल दे
क्या मिलेगा आज कल पे टाल के

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