महानगर दिल्ली बनाम शहर इलाहाबाद
*******************************( कविता)
खुला वातावरण है पर प्रदूषित हवा है,
लगता है महानगर दिल्ली हमसे खफा है/
सोसायटी से दो मील दूर दो बाजार हैं,
साठ-साठ रुपये खर्च करने पर चाय की दुकान है/
दस रुपये की एक कप चाय के लिए सफर करते हैं,
इसी हाल में हम दो साल से दिल्ली में बसर करते हैं/
हमारी सोसायटी में न चिड़िया न चिड़िया के पर,
कबूतर ढेरों हैं, बालकनी की मुँडेरों पर चुग्गा चुगते हैं/
हमारे पास जाने पर जरा भी न घबराते हैं,
अपनी गोल-गोल आँखों से निहार फिर मशगूल हो जाते हैं/
चार पार्क हैं, रखवाली करते माली और चौकीदार हैं,
हम ताजा-तरीन फूलों, तितलियों के शौकीन पर देर से उठ पाते हैं/
सोसायटी में बहुमंजिली इमारतों में कुत्ते पाले जाते हैं,
इंसान हमें नहीं पहचानते, पर कुत्ते हमें कुछ समझते हैं/
गेट के बाहर आवारा कुत्तों की खेप की खेप है,
कितनों को काट चुके हैं, किसी से जरा भी नहीं डरते हैं/
सरकार ने भी उनके लिए शेल्टरहाल बनवाए हैं,
वे उसमें रहने को तैय्यार नहीं, उसका मखौल उड़ाते हैं/
गेट के एटीएम पर इक्के-दुक्के ऊँघते- भौंकते मिल जाते हैं,
छोटे बच्चों का जाना तो दूर, बुजुर्ग भी पैसा निकालने में डर जाते हैं/
यहाँ जो कुछ भी है, बहुत दूर- दूर, ज्यादा फैलाव में है,
जाड़ा ज्यादा हो तो गर्मी का अहसास तो सरकारी अलाव में है/
पर उसकी व्यवस्था भी यहाँ नहीं दिखाई पड़ती है,
शाम को इसलिए नहीं निकलते," रूम- हीटर" से दूर ठंड करते हैं/
डेढ़-दो मील के अंतर पर ढेरों भगवानों का एक मंदिर है,
सभी देवी- देवता हैं पर शनीचर भगवान की लोग विशेष अर्चना करते हैं/
अभी चाँदनी- चौक की भीड़ ही हमने एक मर्तबा देखी है,
" कनाट प्लेस" के दर्शन को अपने लिए हम सपना समझते हैं/
कभी हरियाणा निकल गए, कभी यू ० पी० के मथुरा में दर्शन करते हैं,
हम तो बाँके- बिहारी की अदा में सैकड़ों छटा का अभिनंदन करते हैं/
शहर इलाहाबाद
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कस्बे में मेरा पैतृक आवास है, रंगीनियों से भरा हुआ,
चार चाँद- चेहरे थे ऐ शहर उनका हाल क्या हुआ?
वर्षों से उधर के लिए निकलना मुहाल हुआ है,
अब तो यहाँ रह कर जीना भी एक जंजाल हुआ है/
मेरे आवास से तीन मील के अर्थव्यास में सभी कुछ आ जाता है,
पिक्चर हाल्स ते लेकर चौक तक उसमें नप जाता है/
मेरे मुहल्ले में ही तीन प्राइमरी कान्वेन्ट स्कूल आ जाते हैं,
तीन इंटर कालेज, दो डिग्री कालेजेज उसी फ्रेम में फिट हो जाते हैं/
मेरे चौराहे पर ही नहीं, उसके चारों ओर के अगले चौराहों तक,
सभी कुछ मयस्सर हो जाता है, चाय से लेकर सिगरेट, समोसे तक/
मेरे चौराहे पर तीन तरफ चाय और मिठाई नमकीन की दुकानें हैं,
छिटपुट सामान और दूध के पैकेट के लिए कई- कई दुकानें हैं/
चौराहे पर से ही सुबह- शाम सब्जी मंडी लगती है,
बगल की दुकान पर जलेबी- इमरती, कचौड़ी समोसे मिलते हैं/
कभी चाय की चुस्की लेने के लिए चायवाले के चबूतरे पर बैठ जाता था,
फुटपाथ पर हर कोई चाय के इंतजार में सुबह- सुबह अखबार पढ़ता था/
सड़कों के चौड़ीकरण ने फुटपाथों को धवस्त कर के अपने हाल पर छोड़ दिया,
उनके नीचे नाले खोज कर लोहे के छड़ों की सीढ़ियाँ लगवा डाला/
अब सुना है कि फुटपाथ मुहल्ले से गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो गए हैं,
उनकी जगह यत्किंचित सड़कों का चौड़ीकरण कर दिया गया है/
शहर की आम- जिन्दगी अस्त-व्यस्त- ध्वस्त पूरी तरह से कर दी गई है,
मुहल्ले के मुख्य बाजारों का चौड़ीकरण अभी तक नहीं हो पाया है/
मैं अपने शहर जब- जब जाने की किसी से बात भी करता हूँ,
बाल-बच्चे सनझाते हैं, इलाहाबाद में अब कुछ नहीं बचाह है/
शहर का दिल राजनैतिक माहौल से चरमरा कर रह गया है,
हर तरफ टूटे हुए सपने हैं, और सिमटा हुआ अरमान रह गया है/
मैं भी सोचता हूँ, मेरे सपने अब सपने ही रह जाएँगे क्या,
हकीकत की जमीन पर उतर कर वो दाना नहीं चुगेंगे क्या?
मेरा शहर भी उग्रवादी है, किसी की नहीं सुनता, अपनी ही करता है,
वह तभी हमारी बात सुनेगा, जब हम उसकी भी सुनेंगे/
सब समझता हूँ, तोड़-मरोड कर मगर अपनी ही बात पे अड़ता हूँ,
सब सही है पर" जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी" को मानता हूँ/
अपने आँचल में वह ह में तभी समेट सकेगा" रतन"
जब हम अपनी बाहें फैला कर उसकी ओर निहारेंगे//
राजीव" रत्नेश"
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