सूरज पृथ्वी के चक्कर में,
दुनिया की हर चीज सफर में,
हम- तुम बेसफर कैसे हो सकते हैं/
सदियों से निकला हूँ सफर में,
तूने पैगाम भी भेजा सफर में,
तू गोल- गौहर थी, गुलमोहर थी,
तुझे अपना कभी सोचा ही नहीं/
सालों-साल हम साथ- साथ रहे,
इश्क का भूत तेरे सर चढ़ बोला,
मौका सही जान तेरे बाप ने,
तुझे लत्ती लगा दी/
मैं पाँच- आठ का, तू पाँच- छै की,
निभ सकता था साथ तेरा-मेरा भी,
तूने बाप के सामने हामी न भरी,
अपने प्यार की दुहाई न दी/
तू एक अंजान सफर पे चली गई,
मजबूरी में या मनमर्जी के तहत,
तुम्हें निपटाया कर्मखर्ची में,
बाप की मर्जी से गई/
तुमने किससे नहीं बेवफाई की,
गैर ने ही तेरी शादी में तेरी शामत बुलाई,
तेरा बाप भी था अपने गिरोह का सरगना,
एक- एक पहलवान की करा दी पिटाई/
सबके अपने- अपने संस्कार होते हैं,
मेरे संस्कार का कोई मोल था नहीं,
अपनी धुरी छोड़ किस जानिब गई,
मेरे मोहपाश ते निकल और के साथ बँधी/
क्या दुख तूने सहे, क्या गम मैंने झेले,
किसी ने साथ न पूछा, पड़ी अकेले,
शहर तेरे मेरे अदल-बदल गए,
तू अपने प्यार को देखे या औरों की तमीज सही/
छूट गया तेरा सपनों के सफर में आना-जाना,
भारी पड़ा तुझे किसी से दिल लगाना,
पहले भी पराई थी, अब भी पराई हुई,
तुम लगातार सफर में बनी रही/
कोई रास्ता न रहा, तेरे मिलन का,
क्यूँकि तू मुझसे भी आगे निकल गई//
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