Monday, July 13, 2026

आज की रात जवाब दे दे ( गजल )

आज की रात जवाब दे दे  ( गजल  )
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गमे- हिज्र में यूँ फँसा कि कोई फसाना नहीं मिलता/
यूँ भी मुकम्मल मुझे कोई प्यार का जहां नहीं मिलता/

तेरा कुछ हाल तो कभी कोई ठिकाना नहीं मिलता,
कभी जमीं नहीं तो कभी कोई आस्मां नहीं मिलता/

तेरे होंठों की लग्जिश ने कुछ यूँ चाल चल दी,
कि अर्जे- खाक भी इतना कभी बेनिशां नहीं मिलता/

उदास शजर को देखा तो दिल हदस कर रह गया,
नादान इस तरह भी किसी को सहरा नहीं मिलता/

पलकों तले की बेपर्दगी तारी थी दूर- दूर तलक,
अश्के- गम भी दो बूँद दरमियाँ नहीं मिलता/

दिल की धड़कनों ने कोहराम सा अंदर मचा दिया,
जुल्फे- बरहम को कभी थोड़ा ताजियाना नहीं मिलता

तुझको छूकर आती तो है नसीमे- सहर भी, क्या पता,
मेरे दिल को कभी तेरे प्यार का आशियाना नहीं मिलता/

शहर का वाहियात मौसम कभी तो खुशगवार भी होगा,
खुदा की रहमत है कि मुझे तेरा कोई समाचार नहीं मिलता/

हुनरमंद हैं जमाने में एक से बढ़ कर एक, सदा देते तुझे,
शहर की गलियों में ढूंढ़ता हूँ, पर वो जमाना नहीं मिलता/

तेरे प्यार में तड़प-तड़प कर ही लगता है कि जान जाएगी,
मुझे तेरी मुहब्बत का कोई इश्तहार नहीं मिलता/

आकर मंजिल पे मिल जाओ, बिछड़े राही की तरह,
मुझे लिखने को अब नया तेरा कोई फसाना नहीं मिलता/

कल तारीख बदल जाएगी, आज की रात तक मुझे जवाब दे दे,
' रतन ' को कभी ये मौसम आशिकाना नहीं मिलता/

              राजीव रत्नेश
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