Saturday, September 19, 2026

फिर आशना अजनबी- सा गुजर गया ----- गजल

फिर आशना अजनबी- सा गुजर गया
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गजल---- राजीव रत्नेश

फिर आशना अजनबी- सा गुजर गया,
एक उदास लम्हा जाते-जाते ठहर गया/

जिसे अपना समझ कर उम्र भर संजोया था,
वो मेरी आँख से होकर दिल में उतर गया/

बहुत कुछ कहने को था उसके सामने मगर,
वो मेरी खामोशी पढ़ कर ही गुजर गया/

मैं रोकता भी तो आखिर उसे रोकता कैसे,
वो हाथ छुड़ा कर मेरी जिंदगी से निकल गया/

एक ख्वाब था जिसे आँखों में रख के जीते रहे,
सहर हुई तो वो ख्वाब भी बिखर गया/

तेरी यादों का सिल्सिला कुछ ऐसा चला,
मैं भूलना भी चाहता था मगर याद आ गया/

कभी जो दर्द था, वही अब सहारा है मेरा,
वो जख्म भरते-भरते और गहर गया/

हमने तो उम्र भर रिश्ते निभाने की सोची थी,
वक़्त बदला तो हर वादा बिखर कर गुजर गया/

अब न शिकवा है उससे, न कोई गिला बाकी,
जो मेरा था ही नहीं, मुझसे होकर गुजर गया/

' रतन ' अजीब है खेल ये मुहब्बत का भी,
वो दूर होता गया, उतना ही निरवर गया/

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!