फिर आशना अजनबी- सा गुजर गया
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गजल---- राजीव रत्नेश
फिर आशना अजनबी- सा गुजर गया,
एक उदास लम्हा जाते-जाते ठहर गया/
जिसे अपना समझ कर उम्र भर संजोया था,
वो मेरी आँख से होकर दिल में उतर गया/
बहुत कुछ कहने को था उसके सामने मगर,
वो मेरी खामोशी पढ़ कर ही गुजर गया/
मैं रोकता भी तो आखिर उसे रोकता कैसे,
वो हाथ छुड़ा कर मेरी जिंदगी से निकल गया/
एक ख्वाब था जिसे आँखों में रख के जीते रहे,
सहर हुई तो वो ख्वाब भी बिखर गया/
तेरी यादों का सिल्सिला कुछ ऐसा चला,
मैं भूलना भी चाहता था मगर याद आ गया/
कभी जो दर्द था, वही अब सहारा है मेरा,
वो जख्म भरते-भरते और गहर गया/
हमने तो उम्र भर रिश्ते निभाने की सोची थी,
वक़्त बदला तो हर वादा बिखर कर गुजर गया/
अब न शिकवा है उससे, न कोई गिला बाकी,
जो मेरा था ही नहीं, मुझसे होकर गुजर गया/
' रतन ' अजीब है खेल ये मुहब्बत का भी,
वो दूर होता गया, उतना ही निरवर गया/
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