अरे ना रे बाबा ना
राजीव रत्नेश
एक तो औरत, दूजे बंगालिन,
चले न सीधी चाल, अरे ना रे बाबा ना/
उसकी मेरी न जात एक समान,
मैं हड्डी वो कवाब, अरे ना रे बाबा ना/
भाई उसका चाहे उसकी शादी मुझसे,
मैंने भी तो पहले से न किया इंकार/
वो औरत थी या जंजाल, अरे ना रे बाबा ना/
गुलाबी रंग पोते हाथों में गया उसके द्वार,
गालों पर खड़ी-खड़ी पुतवाए रंग, फेंके मुस्कान/
वो हँसिया थी या कुदाल, अरे ना रे बाबा ना/
अब न करेंगे घर पे उसके कभी शाम,
खाई है कसम, लूँगा न उसका नाम/
उसका भाई सपेरा, वो नागिन विकराल, अरे ना रे बाबा ना/
उसने मेरे इर्द-गिर्द बिछाया काँटों का जाल,
दाँत उसके, कुंदे की कर डालें चीर-फाड़/
औरत थी या बवाले- जान, अरे ना रे बाबा ना/
मेरा दावा था बलबूते ले जाऊँगा उसे उसकी ससुराल,
वो चाहे, उसके भाई से करूँ उसकी शादी की बात/
जतन करे लाख, गले न दाल, अरे ना रे बाबा ना/
मुस्तैद थी वो, मैं ही न था चालाक,
बिना शादी किए ही दिया तलाक/
एक तो पराई- जात, ऊपर से छिनाल, अरे ना रे बाबा ना//
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मर्जी के मालिक हैं अपने आप के,
नौकर किसी छिनाल के कल थे न आज हैं/
राजीव रत्नेश
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