Saturday, September 19, 2026

अरे ना रे बाबा ना ( कविता )

अरे ना रे बाबा ना
     राजीव रत्नेश

एक तो औरत, दूजे बंगालिन,
चले न सीधी चाल, अरे ना रे बाबा ना/

उसकी मेरी न जात एक समान,
मैं हड्डी वो कवाब, अरे ना रे बाबा ना/

भाई उसका चाहे उसकी शादी मुझसे,
मैंने भी तो पहले से न किया इंकार/

वो औरत थी या जंजाल, अरे ना रे बाबा ना/

गुलाबी रंग पोते हाथों में गया उसके द्वार,
गालों पर खड़ी-खड़ी पुतवाए रंग, फेंके मुस्कान/

वो हँसिया थी या कुदाल, अरे ना रे बाबा ना/

अब न करेंगे घर पे उसके कभी शाम,
खाई है कसम, लूँगा न उसका नाम/

उसका भाई सपेरा, वो नागिन विकराल, अरे ना रे बाबा ना/

उसने मेरे इर्द-गिर्द बिछाया काँटों का जाल,
दाँत उसके, कुंदे की कर डालें चीर-फाड़/

औरत थी या बवाले- जान, अरे ना रे बाबा ना/

मेरा दावा था बलबूते ले जाऊँगा उसे उसकी ससुराल,
वो चाहे, उसके भाई से करूँ उसकी शादी की बात/

जतन करे लाख, गले न दाल, अरे ना रे बाबा ना/

मुस्तैद थी वो, मैं ही न था चालाक,
बिना शादी किए ही दिया तलाक/

एक तो पराई- जात, ऊपर से छिनाल, अरे ना रे बाबा ना//

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मर्जी के मालिक हैं अपने आप के,
नौकर किसी छिनाल के कल थे न आज हैं/

              राजीव रत्नेश
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