अपने फन को सलामत ही रख ( गजल )
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दिल में शूल है, लब पे उसूल है/
यही जिंदगी का अजब दस्तूर है/
दर्द को हमने हँस कर कबूल किया,
यही इश्क का शायद पहला उसूल है/
जिसे अपना समझा, वही दूर हो गया,
इश्क का फैसला कितना मुश्किल है/
हर एक मुस्कराहट के पीछे छिपा,
किसी बेबसी का ही एक शूल है/
न शिकवा किया, न गिला ही किया,
यही दिल का सदियों पुराना वसूल है/
धूप कितनी भी हो, सिर नहीं झुकता,
मेरे किरदार का यही तो नूर है/
जख्म गहरे मिले, मुस्करा भी दिए,
दर्द से दोस्ती ही अब तो दस्तूर है/
राह काँटों भरी थी, चला भी वही,
जिसके सीने में जीने का सुरूर है/
दिल को बेचूँ तो आसां हो जिंदगी,
पर लब पे अब भी उसूल है/
कल से चंदा अजब पशो- पेश नें है,
क्या कहा उसने कि मेरे माथे पे शिकन है/
' रतन ' अपने फन को सलामत ही रखना,
यही दौलत है, बाकी तो सब फिजूल है//
राजीव रत्नेश
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