चाय के प्याले में धुँआ उठे जैसे
--- राजीव रत्नेश
चाय के प्याले में धुँआ उठे जैसे,
मेरी आँखों में भी नशा उठे जैसे/
मुझे दूर से भी पुकारना, मैं तेरे साथ हूँ,
तू दिखे दूर, मगर पास हो जैसे/
हमारी नजदीकी को जमाने ने गलत माना,
तुझे नाम लगा, मेरे लिए रुसवाई हो जैसे/
दरिया किनारे मछलियाँ मिलें भी कैसे,
काँटे में फँसाने वाला बैठा हो जैसे/
मेरा टिफ़िन रोज लाती है साहिल पर,
सोचती है, कश्ती में दूर ले जाऊँ जैसे/
मुहब्बत की गहराई काश! वो समझें,
अफ़साने भी कोई झूठे हुए जैसे/
लोग हाथ की लकीरें यूँ ही पढ़ा करते हैं,
खुद ही लिखा हो, खुद समझें जैसे/
यहाँ तो हर कोई हड़बड़ाहट में है,
हर मकाँ भूतों का बसेरा हो जैसे/
वास्ता देते हो खुदा का तो मुझको,
दिल में तेरे अभी ख़ौफ- ए- ख़ुदा हो जैसे/
सहम- सहम कर इश्क में जीते हैं हम,
जिन्दगी काटना भी अब खता हो जैसे/
""""""""""""

No comments:
Post a Comment