Monday, October 26, 2026

बुलबुल के लिए

भूमिका: कुछ लोग अपनी चाहत को बुलबुल की तरह सहेजते हैं, और दुनिया उसे क़फ़स में डालने, उसकी बोली लगाने निकल पड़ती है। यह ग़ज़ल उसी बुलबुल के लिए है, जिसके लिए शायर ने सब कुछ लुटा दिया, और जो ख़ामोश रहे, वही उसके सबसे क़रीब निकले।
बुलबुल को निशाने पर लेने फिर तीरंदाज़ निकले,
ऊँची उड़ान पर जिसकी कितने ही एतराज़ निकले।
इस डाल से उस डाल तक परिंदे चीख़ते उड़े,
बचाने जो आए, वो आम लोग हमआवाज़ निकले।
मेरी नज़र में सिर्फ़ उनके डर के साये समाए रहे,
जिनकी आँखें नम थीं, वही मेरे दमसाज़ निकले।
मौन मैं भी था, उदास जान-ए-चमन बुलबुल भी थी,
ख़ामोश रहे जो, वही दिल के हमराज़ निकले।
क़फ़स में उसे डालने फिर इक बहेलिया आया,
फुसलाने को उसे कई गुल भी दग़ाबाज़ निकले।
अनजान मुसाफ़िर मैं भी था उसके शहर का, मगर
मोहब्बत में हम बेदाग़, सादा-मिज़ाज निकले।
कौड़ियों के भाव बुलबुल की बोली लगाई गई,
ऊँची बोली लगाने वाले कई मुहरबाज़ निकले।
मोहब्बत के पाठ में पढ़ा था, आख़िर तक निभाना,
जो कभी मिले भी नहीं, वही रुतबे में सरफ़राज़ निकले।
"रतन" ने बुलबुल के लिए सब मुहरें लुटा दीं,
बाक़ी सब दिल के कंजूस, मोहब्बत के मोहताज निकले।
शब्दार्थ
तीरंदाज़: तीर चलाने वाला, शिकारी
एतराज़: आपत्ति
परिंदा: पक्षी
हमआवाज़: साथ पुकारने वाला
दमसाज़: हर साँस का साथी, निकट मित्र
हमराज़: राज़ जानने वाला, विश्वासपात्र
जान-ए-चमन: बाग़ की जान
क़फ़स: पिंजरा
बहेलिया: चिड़ीमार
दग़ाबाज़: धोखेबाज़
सादा-मिज़ाज: सरल स्वभाव वाला
मुहरबाज़: सोने की मुहरों से बोली लगाने वाला
सरफ़राज़: सम्मानित, ऊँचे पद वाला
मोहताज: ज़रूरतमंद

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!