Monday, October 26, 2026

झील में चाँद

भूमिका: रूप को शब्दों में बाँधना हमेशा मुश्किल रहा है। यह ग़ज़ल एक ऐसे सौंदर्य की है जो झील में उतरे चाँद की तरह शांत, ठहरा हुआ और नज़ाकत भरा है। शायर की क़लम बार-बार उसी चाँद पर लौटती है, और अंत में वही रूप उसकी ग़ज़ल बन जाता है।
तेरा रूप-शृंगार है कुछ ऐसे,
उतरा है झील में चाँद जैसे।
पलकों की ओट में कुछ राज़ छुपा है,
कोई चुपके से ख़त रखता हो जैसे।
तुझे देखकर लफ़्ज़ ठहर जाते हैं मेरे,
तारीफ़ करूँ तेरी तो करूँ मैं कैसे?
ज़ुल्फ़ों की घटा, माथे की बिंदिया,
रात ने सुबह को सँवारा हो जैसे।
तेरी हँसी की खनक सुनकर लगा,
मंदिर में घंटियाँ बजी हों जैसे।
तू जैसी है, कोई सँवरे भी तो वैसे,
चाँद भी झील में उतरे तो कैसे?
"रतन" की क़लम में उतर आई है तू ऐसे,
ग़ज़ल कोई पूरी हुई हो जैसे।
शब्दार्थ
शृंगार: सजावट, सजने-सँवरने की कला
ओट: आड़, पर्दा
घटा: बादलों का घना झुंड
बिंदिया: माथे की सजावटी बिंदी
खनक: धातु या हँसी की मधुर गूँज
नज़ाकत: कोमलता, सुकुमारता

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!