तेरा रूप-शृंगार है कुछ ऐसे,
उतरा है झील में चाँद जैसे।
पलकों की ओट में कुछ राज़ छुपा है,
कोई चुपके से ख़त रखता हो जैसे।
तुझे देखकर लफ़्ज़ ठहर जाते हैं मेरे,
तारीफ़ करूँ तेरी तो करूँ मैं कैसे?
ज़ुल्फ़ों की घटा, माथे की बिंदिया,
रात ने सुबह को सँवारा हो जैसे।
तेरी हँसी की खनक सुनकर लगा,
मंदिर में घंटियाँ बजी हों जैसे।
तू जैसी है, कोई सँवरे भी तो वैसे,
चाँद भी झील में उतरे तो कैसे?
"रतन" की क़लम में उतर आई है तू ऐसे,
ग़ज़ल कोई पूरी हुई हो जैसे।
शब्दार्थ
शृंगार: सजावट, सजने-सँवरने की कला
ओट: आड़, पर्दा
घटा: बादलों का घना झुंड
बिंदिया: माथे की सजावटी बिंदी
खनक: धातु या हँसी की मधुर गूँज
नज़ाकत: कोमलता, सुकुमारता

No comments:
Post a Comment