भूमिका: मंज़िल अक्सर उतनी बड़ी नहीं होती, जितना बड़ा उसका रास्ता होता है। यह ग़ज़ल उसी रास्ते की है: गिरने, फिसलने, ठोकरें खाने और फिर भी चलते रहने की। जो लोग काँटों के डर से पीछे रह गए, उनसे कोई शिकायत नहीं; और जो मिला, उसमें सबसे क़ीमती वे तजरबे निकले जो सफ़र ने दिए।
मंज़िल तक आ पहुँचा हूँ रास्ता बदल-बदल के,
गिर-गिर कर उठा हूँ कई बार फिसल-फिसल के।
आगे बढ़ता ही रहा हूँ ठोकरें खा-खा के,
लोग पीछे रह गए काँटों के डर से टल के।
कुछ ने रोका, कुछ ने टोका, कुछ ने कहा "सँभल के",
मैं चला अपनी ही धुन में, हर बार मचल के।
धूप ने जलाया मुझको, पर मैं रुका नहीं हूँ,
सोना बना हूँ अक्सर आग में पिघल के।
अँधेरों से क्या डरना, सुबह इन्हीं में पलती है,
सूरज भी तो उगा है रात से निकल के।
मंज़िल पे आके जाना, दौलत तो रास्ता थी,
कितने मिले हैं मुझको तजरबे असल के।
"रतन" की जीत पर हैरान मत हो लोगो,
हर हार के साँचे में निकला है वो ढल के।
शब्दार्थ
मंज़िल: लक्ष्य, गंतव्य
फिसलना: पैर का डगमगाकर गिरना
ठोकर: चलते हुए पैर का किसी चीज़ से टकराना, ज़िंदगी की चोट
टल जाना: रास्ते से हट जाना, पीछे हट जाना
सँभल के: सावधानी से
मचलना: उमंग या ज़िद में आगे बढ़ना
पिघलना: गर्मी से तरल हो जाना
तजरबा: अनुभव
असल: वास्तविक, सच्चा
साँचा: वह ढाँचा जिसमें ढालकर आकार दिया जाए

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