Monday, October 26, 2026

साँकल लगी है दर पर

भूमिका: कभी-कभी दरवाज़ा भीतर से बंद होता है और बाहर खड़ा चाहने वाला भी हार मानने को तैयार नहीं होता। यह ग़ज़ल उसी ज़िद की है, जिसमें ठुकराए जाने के बाद भी न शिकवा है, न कड़वाहट, बस इतनी चाह है कि किसी भी तरह उसे अपने क़रीब बुला लिया जाए।
मैं हार मान कर भी गीत गाना चाहता हूँ,
हर हाल तू मेरी है, तेरी प्रीत निभाना चाहता हूँ।
साँकल लगी है दर पर अंदर से, तो क्या करूँ?
किसी तरह भी तुझे क़रीब बुलाना चाहता हूँ।
मेरे प्यार की नेमत भी तूने आख़िर ठुकरा दी,
सेहरा बाँध के आना था, वो दिन लौटाना चाहता हूँ।
कहकशाँ से आसमान में आतिशबाज़ी-सी हुई,
बिजली की चकाचौंध में तुझे उड़ा ले जाना चाहता हूँ।
ज़माना लाख रोके, अपने मंसूबे भी आज़मा ले,
तुझे तेरे क़फ़स से दूर ले जाना चाहता हूँ।
कहीं से इक सितारा ज़मीं पर एहसान बन के आया था,
उसको सिर्फ़ अपना ही एहसानमंद बनाना चाहता हूँ।
ग़मज़दा हूँ "रतन", पर इतना नहीं कि तुझे ही हार जाऊँ,
ना सुन के आजिज़ हूँ, तेरी हाँ ही पाना चाहता हूँ।
शब्दार्थ
साँकल: दरवाज़े की कुंडी
नेमत: वरदान, अनमोल देन
सेहरा: दूल्हे के सिर पर बाँधी जाने वाली फूलों की लड़ी
कहकशाँ: आकाशगंगा
आतिशबाज़ी: पटाखों और रोशनी का खेल
मंसूबा: इरादा, योजना
क़फ़स: पिंजरा, क़ैद
एहसान: उपकार
एहसानमंद: आभारी
ग़मज़दा: दुख से भरा
आजिज़: तंग, परेशान

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!