भूमिका: सच्चा प्रेम सिर्फ़ चेहरे का नहीं होता, उसमें स्वभाव की ख़ुशबू भी चाहिए। यह ग़ज़ल एक ऐसे साथी की है जिसमें रूप और गुण दोनों एक साथ मौजूद हैं, जैसे दो नदियों का संगम, और जिसका मिलना ही तीर्थ के दर्शन जैसा है।
गुल भी चाहिए साथ नकहत भी,
सीरत भी चाहिए साथ सूरत भी।
तुझ में दोनों हैं, साथ-साथ मौजूद,
तू ही मेरा संगम, तू ही ज़ियारत भी।
सिर्फ़ चेहरा नहीं, मुझे चाहिए,
दिल की सच्चाई, नेक नीयत भी।
तेरी नज़रों में है शरारत भी,
तेरी नज़रों में है शराफ़त भी।
तेरा मिलना ही है ग़नीमत भी,
और यही है मेरी दौलत भी।
इश्क़ तुझसे हुआ तो बन बैठी,
तेरी ख़ुशबू मेरी आदत भी।
माँगता है "रतन" ख़ुदा से यही,
तू ही उसकी दुआ, इनायत भी।
शब्दार्थ
गुल: फूल
नकहत: ख़ुशबू
सीरत: स्वभाव, चरित्र
सूरत: चेहरा, रूप
संगम: नदियों का मिलन
ज़ियारत: तीर्थयात्रा, पवित्र स्थान के दर्शन
नीयत: इरादा
शरारत: चंचलता, नटखटपन
शराफ़त: भलमनसाहत
ग़नीमत: सौभाग्य, ग़नीमत की बात
इनायत: कृपा, मेहरबानी

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