Monday, October 26, 2026

नकहते-गुलाब

भूमिका: कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिनकी तारीफ़ के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं। यह ग़ज़ल एक ऐसी ही भोली, नादान और बेहिसाब ख़ूबसूरत शख़्सियत की है, जो आकाशगंगा की चमक भी है और बाग़ की ख़ुशबू भी।
कहकशाँ में सितारों की आब है वो,
बाग़ों की नकहते-गुलाब है वो।
दिल की बात भी नहीं समझ पाती,
भोली-नादान, पर लाजवाब है वो।
नींद आती नहीं तो ग़म क्या है,
जागती आँखों का ख़्वाब है वो।
सवाल बनकर उतरी दिल में मेरे,
और ख़ुद ही मेरा जवाब है वो।
लब ख़ामोश हैं, आँखें हैं बोलती,
हया का ओढ़ा हुआ नक़ाब है वो।
जिसे पढ़ता रहूँ मैं उम्र भर,
इश्क़ की ऐसी इक किताब है वो।
"रतन" क्या कहे उसकी तारीफ़ में,
हर तारीफ़ से परे, बेहिसाब है वो।
शब्दार्थ
कहकशाँ: आकाशगंगा
आब: चमक, दमक
नकहत: ख़ुशबू
नादान: भोली, अनजान
लाजवाब: जिसका जवाब न हो, बेमिसाल
हया: लज्जा, शर्म
नक़ाब: परदा
बेहिसाब: अनगिनत, बहुत ज़्यादा

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ROM ROM SE KARUNAMAY, ADHARO PE MRIDU HAAS LIYE, VAANI SE JISKI BAHTI NIRJHARI, SAMARPIT "RATAN" K PRAAN USEY !!!