Friday, September 3, 2010

तू मुझे प्यार करे ......!!!

प्यार तो एक समंदर है
जिसकी नहीं कोई थाह
हम तुम मुसाफिर हैं
जीवन है एक छोटी नाव !


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पहले इसके दुश्मनी हमसे संसार करे
मैं तुझे प्यार करूँ तू मुझे प्यार करे ।

कौन आता है मुक़ाबिल वफ़ा के देखें
मैं तेरा इंतज़ार करूँ तू मेरा इंतज़ार करे ।

बिला वजह तंगदिल है आशियाना सारा
मैं तेरा दीदार करूँ तू मेरा दीदार करे ।

कहते हैं तो मिलते हैं सनम कहीं भी
मैं तेरी बात करूँ तू मेरी बात करे ।

कद्र्दाने हुस्न बहुत हैं तेरा ध्यान इधर
मैं तेरा ख्याल करूँ तू मेरा ख्याल करे ।

राहे वफ़ा में आता है वक़्त कभी नामुनासिब
मैं तेरा मुन्तशिर हूं तू ख्याले जज़्बात करे ।

तेरे लबों की खामोशी कुछ कहती है
मैं तुझसे इज़हार करूँ तू मेरा इमदाद करे ।

सनमखाना है तेरा बूते महफिले हरम
मैं तुझे पेश करूँ तू मुझे पेशे जाम करे ।

जीने का करीना तुम्ही से सीखा है हमने
आओ बज़्म में हम तेरा इस्तकबाल करें ।

शोहरत तेरी हर महफ़िल हर बुतखाने मे
मैं तुझे सलामे नज़र करूँ तू मुझे सलाम करे ।

वाइज़ के कहने से कैसे तौबा कर ले हम
तू जब तक न कहे कैसे तुझे अलविदा कहें ।

दरियाए मुहब्बत में भंवर भी मंझधार भी
तुम मुझे साहिल बख्शो हम तुझे पार करें ।

कौन कहता है शम्मे महफ़िल में नूर नहीं
अपने फलसफे मे फ़साने में तुझे किरदार करें ।

तू कहीं आसमानों से उतर कर आती हो 'ताज '
मैं तुझे माहताब कहूं तू मुझे आफताब कहें ।

अब तो अपना दिल कहीं भी लगता नहीं
'रतन ' तुझे खुशहाल करे तू मुझे आबाद करे ।

ये बहार न होती ....!!!

मेरी जिंदगी मे ये ख़ुशी ये बहार न होती
गर कश्तिये जिंदगी के लिए याद पतवार न होती ।

बिखरते_ बिखरते रह गया मेरा चंचल मन
चूड़ियों की खनखनाहट में उलझ गया ये जीवन
मस्ती छिटकी, प्यार की हवा अंगनाई अंगनाई चली
नेह_नाता तुमसे बन गया प्रीत का अनमोल बंधन ।

फिर जिंदगी का रिसता ज़ख्म कैसे भर जाता
जब मुझे बहलाने को पायल की झंकार न होती ।

तुम्हारे होठों की लाली बन गयी तक़दीर मेरी
सौगाते जिंदगी बन गयी है ये तस्वीर तुम्हारी
सुकून बन के जिंदगी मे आई हो ऐ हमकदम
मेरे ज़ख्मों को सहलाने की अच्छी है तदबीर तुम्हारी ।

शर्मो हया का आँचल जो लगा लेती रुख से अपने
तो तुम्हारी आब्शारेज़ुल्फ़ की ठंडी फुहार न होती ।

तुम्हारे न होने से आज प्यास फिर बढ़ गयी है
एक आग सी दिल मे मेरे फिर लग गयी है
जाने क्या सोच कर तुम पैगामे रुसवाई भेजती हो
जबकि संवर के ये दुनिया मेरी फिर बदल गयी है ।

पा कर तुम्हारा साथ साजे जिंदगी छेड़ दिया था मैंने
तुम अदाए जफा छोड़ देती तो जिंदगी अंगार न होती ।

मौसमे बहार में हर कली महकी महकी थी
शाखे जिंदगी पर हर बुलबुल कुहुकी कुहुकी थी
वो झरनों की घाटी में देवदारों के साए तले
हर बात तुम्हारी मीठी हर अदा बहकी बहकी थी

अब तो हर तमन्ना पर पद गया है मौत का साया
तुम जो मिल जाती तो जिंदगी ये सोगवार न होती ।

मेरी जिंदगी में ये ख़ुशी ये बहार न होती
गर कश्तिये जिंदगी के लिए याद पतवार न होती ।
जो कुछ सुनाना है सुना दे ऐ दिल ,
आज फिर बज़्म मे वो आये हुए हैं ।
दर्द का असर उन पर भी है मालूम ,
मगर बात वो होठों मे दबाये हुए हैं ।