Monday, July 20, 2009

वो चीज़ ही है कुछ और ,..!!

हम जिस पर मर रहें हैं
वो चीज़ ही है कुछ और
जहाँ मे दूसरा नहीं
उसके सिवा कोई और ।

बना रहा था खुदा जाने कब से
चाँद सितारों को
भूले से बन गया उससे
वही बस मेरा और ।

हमें भी यकीन था
उसके वादे का
शाम को मिलने का वादा था
पूछा तो बोले वो शाम थी और

तगाफुल न हुआ उससे कभी
हक मार दिया किसी का और
माना वो ज़हीनो से ज़हीन है
उसका भी नहीं कोई और ।

ये बात अजीब लगती है
क्यो नही उसका और
पुछा तो बोली इठला कर
दीवाना तुमसे नहीं और ।

फूलों से नाज़ुक लब हैं
शफ्फाक नहीं कोई और
संग तराश हार गए
नही बन सका उससे और ।

हम ही है की लफ्जों में
पीरों के बनाया बेमिसाल
वरना शायरी का भी
होता है कोई और _छोर ।

शिकवा उससे नहीं
ज़माने से है गिला
जिसे हम चाहते रहे
पर मिला कोई और ।

मिसाल नहीं कहीं
उसके शबाब का और
माहताब शर्मा जाता है
छुओ जाता है चकोर ।

शबनम कहू उसे या
कहू सीप मे पला मोत्ती
और क्या कहें ताज को
'रतन' का भी नही कोई और ॥ !!!!!!!

हम फ़िर से..!!!

हम फ़िर से बिछड़ गए
फ़िर कभी न मिलने के लिए
आंधी तूफ़ान से भी न डरेंगे
मुहब्बत का चिराग दिल मे जलाएं ।

गिला शिकवा कोई तुमसे नहीं
जमाना ही जब दीवार बने
रूहों राग से तुम आशना
फ़िर भी लाखों ज़ख्म दिए ।

हम पहचान न पाए तुमको
तुम हमें जान न सके
हैफ ! बिना नज़रें उठाये क्यो
तुम बगल से गुज़र गए ।

आसमान सर पे उठाएंगे
जो तुम हमसफ़र न मिले
अब तुमसे क्या मिलेंगे
जब ख़ुद से कभी मिल न सके ।

तमाम जलालत झेली हमने
एक राज़_ऐ_परदा दारी के लिए
क्त्त्त्तार तुमने निकाली दफतन
जान निकली भी तो किसके लिए ।

मयकदे मे लुत्फ़ था बेपनाह
जब तक पिलाया साकी ने
जाम की भी क्या भला क्या औकात
पीते थे पैमाना पैमाने से टकरा के ।

किसी ने प्यार किया किसी के लिए खेल
हुस्न के तेवर रोज़ बदलते नए_नए
इल्तजा है यही तुमसे अब 'रतन'
दो हिम्मत ताज को हादसे से उबरने के लिए .... !!!
जान जानी है तो शौक से जाए
रुसवा हुए बस तुमसे नज़र मिला के
इश्क में दीन_ओ_ईमान की क्या कीमत
क्या तीर मारा जवानी लुटा के ।

क्या करे .......!!!!

नाजिल हो रोज़ दिल पर
बलाएँ तो क्या करें
इक बेवफा को भूल न जायें
तो क्या करें ।

राजे इश्क आशकार करे
झूठ मूठ की तोहमतें
हम भी उस पर इल्जाम न
लगाए तो क्या करें ।

वो रोये बहुत हमसे बिचड कर
गुज़रे हद्द से
हम भी अश्कबार वो नज़रें
मिलाएँ तो क्या करें ।

वादा _ऐ_वफ़ा भूल jaana उसी
के वश की बात है
उनको भूलना इतना आसान
नहीं तो क्या करें ।

अपनी भी दुनिया है
अपना भी ज़माना
उसके लिए सबसे दुश्मनी
मोल ले कर क्या करें ।

वो मुज्जस्सिम बुत _ऐ_जफा
अब उससे क्या कहें
उसे भूल भी जायें 'रतन'
तो उसके अदा_ऐ_राज़ क्या करें ।

Sunday, July 19, 2009

तुम शहर छोड़ गए............!!!!!!

बहुत दिन से तुम शहर छोड़ गए
दीदार को आखें तरसती रहीं
जो रोज़ मेरा दिल बहलाती थी
वो आवाज़ बरसो से सुनी नहीं ।

तेरी रहगुज़र से गुज़रा किए बारहा
निगाह उठते ही नज़र नीची करनी पड़ी
किस बात से खफा है सनम
हमारी कोई गलती भी बतायी नहीं ।

बीत गया पतझड़ सूना सूना ही
शायद बहार मे आने की मर्ज़ी नही
तीरंदाज़ हो सबसे बड़े कायनात में
तरकश से तीर कोई निकला ही नहीं ।

हम तेरे डर पे मर मिटे तो भी
हौसला अफजाई करने तुम आई नहीं
रुसवाई के डर से परदे मे कब तलक
ये भी नही नकाब कभी तुमने उठायी नही ।

हमारा ही जिगर था झेल गए चोट
मिटाने की कोई कसर तुमने छोड़ी नही
हम मुब्तिला थे इश्क मे बा_हुस्न
फ़िर भी दावा तुमको की हरजाई नहीं ।

सहरा ऐ दिल पे न हो पायी बरसातें
तुम हुए गाफिल बात हमने छुपायी नही
किसी सूरत तू सूरत दिखा जा
हमने कभी पत्थर की मूरत बनायी नही ।

सर पे चढ़ जाते तुम और भी ज्यादा
हसीनो मे हसीं हो बात हमने बताई नही
दिल को हर वक्त काबू मे रखता 'रतन'
दीगर तुमसा दूसरा कहीं नहीं कभी नहीं ।


साल_ओ_साल पहले............!!!!

साल_ओ_साल पहले देखा था धरती का चाँद
अब दिल मे उसका अक्स भी बाकी नही है ।

छूट गयीं महफिलें सारी पैमाना खाली
प्यास बुझाने को अब कोई साकी नही है ।

फलसफा_ऐ_मुहब्बत दफन हो गई कब्रगाहों मे
कब्र पे फूल चढाने वाला भी बाकी नहीं hai .

इंतज़ार मे तेरे आखें खुली की खुली रही
अब तेरे आने की कोई गुंजाइश बाकी नहीं है ।

परचम_ऐ_इश्क भी तार_तार हुआ दिल छलनी
दिल कहता है यह कोई नाकामी नही है ।

सूख गए अश्क नयन बोझिल से
अब कोई रात हम पे भारी नहीं है ।

कांटो से दामन तार_तार जिगर भी बाकी नही
ज़ख्म नया देने को कोई बाकी नहीं हैं ।

सूरज की करण खिड़की से छन के आई
जो अहसान तुमने किया उसका सानी नहीं ।

मदमस्त आखें ढलती रात उठती जवानी
तेरी फसल पे हमारी कोई जमींदारी नहीं हैं ।

कितना बचाया मगर दिल बेकाबू रहा
'रतन' इस फ़साने मे उसकी किरदारी नही हैं ।

देखा है रूखे रौशन देखा है
एक बार नही हज़ार बार देखा ही।

तुमने तो नही देखा परवाने को
नूर_ऐ_नज़र से हज़ार बार देखा है ।

तैयार बैठे हैं........!!!!!!!!!

ले के चले आओ खंजर हम तैयार बैठे हैं
हो के हर सितम से आजाद सरेबाजार बैठे है ।

किसने कहा तुमसे तर्क_ऐ_मुहब्बत हमने किया
हम तो तुझे ही समझ कसूरवार बैठे हें।

ज़माने ने नहीं दर्द दिया गिला तुझी से है
तुम सोचे पार हो गए सरे_ मंझदार बैठे हैं

किनारे से ही जुदा हो गए तुम
हम भी कश्ती मे बिना पतवार बैठे हैं ।

दिल की आतिश तुमसे रिश्ता जोड़े बैठी है
तुम हो दरिया बुझ जाने को सर_ऐ_आम बैठे है ।

सितारे गर्दिश मे मगर हमने भी ठानी है
वार सहने को तेरा लिए उधार बैठे हैं ।

आसमान से उतर जहाँ पे तू छा गई
दिल मे हम लिए तेरा प्यार बैठे है

रूठ जाओ करो जफा हमें ऐतराज़ नहीं
हम किसी और का लिए ऐतबार बैठे हैं

समझना ही होगा आखिरकार उल्फत को तुझे
हम भी बिगाड़ जिंदगी अपनी आखिरकार बैठे हैं

मुक़द्दस प्यार कहीं देखने को नहीं मिलता
हम भी jafaa का सारा किए इंतजाम बैठे हैं

इतनी भोली न बन ताज तुझको हम जानते हैं
कैसे कटती है रातें तेरा लिए फिराक बैठे हैं ।

न तुझसे ख़त_ओ_किताबत न कोई मलाल
रुसवा हुए किस कदर हुए गुमराह बैठे हैं ।

बहुत हुआ तो कब्र पे मेरी आकर रो लोगे
'रतन' अपनी मैय्यत का लिए सामान बैठे हैं ।