Wednesday, March 5, 2014

SHIQWA !!!

 हम  तुम्हे प्यार करते थे कबसे 
 शायद जब दुनिया नहीं थी तबसे 

 न  चाहा तुझसे कभी कुछ हमने 
 जबकि तू मुझे नहीं मिली थी शायद तबसे 

 कौन  आदम है कौन हौवा है न जाना हमने 
 फिर भी खा ही लिया सेब हमारे  ही वास्ते 

 ज़हरेज़ाम कहूँ या मौतों कि फेहरिस्त 
 तुम मौत हो या इससे बढ़कर नहीं मालूम हमें 

  इरादा न मेरा था न तुम्हारा था फिर मिले कैसे 
  एक अनजान से इशारे से बतौर  सिवा किसके 

  न हम समझे हैं न ही कुछ जानते हैं कोन ज़िम्मेवार 
  कोन खतावार था जब पैदा न हुआ था ज़माना हमसे 

  न गिला न शिक़वा आराम से  रहा 
  कब्र में सोने से पहले न जानते थे मिले थे कब हमसे 

  मैंने भी खुदा के लिए ही खुदा को चाहा 
  ' रतन ' पर मिला न मुझसे कभी वादा करके हमसे 

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Thursday, August 15, 2013

SWATANTRATA JAAN SE PYARI HAI

 हम सब भारत के वीर सिपाही 
 जननी भारत भूमि हमारी है 

 राम ,कृष्ण ,गौतम ,कणाद 
 की महिमा सारे जग से न्यारी है 

 उत्तर में हिमालय , स्वर्ग काश्मीर 
 दक्षिण में सागर ,पूरब बंगाल की खाड़ी है 

 विदेशी ज्ञान  पाने को आते 
 महान यहाँ के तपस्वी ग्यानी हैं 

 शिवा , प्रताप की गाथा अमर 
 याद हमको आज जबानी है 

 धीरज धर लो भारत माता 
 तेरी स्वतंत्रता जान से प्यारी है     

Saturday, July 20, 2013

MOHABBAT SASTI HO NA JAYE

कहीं   दुश्मनी  में  कमी  हो  न  जाये 
दुश्मनी   कहीं   दोस्ती    हो  न  जाये 

तुम लगाकर ठोकर फिर गले लगाओ 
कहीं इससे मुहब्बत सस्ती हो न जाये 

तुम्हारी मुहब्बत कहीं फिर खेल न खेले 
कहीं दुनिया मेरे लिए अजनबी हो न जाये 

अदा  चित्ताकर्षक  अंदाज़   शायराना 
कहीं   क़यामत   अभी    हो   न   जाये 

मैं   तुमसे   सिर्फ    एक   जाम   माँगू 
कहीं   तुमसे  कजअदाई  हो  न   जाये 

न करो  मुझसे  बातें इस  तरह  सनम 
कहीं ज़माना तुम्हारा मुद्दई हो न जाये  

तोहमतें  मुझपर  तुम्हारी  निशानी  हैं 
कहीं  मौत  ही मेरी जिंदगी हो न जाये 

नफ़रत का जज्बा कहीं खत्म हो न जाये 
कहीं   आतिशेदिल   ठंडी   हो   न   जाये 

चंद महीनों का ही साथ रहा  मेरा  तुमसे 
कहीं  फिर  यह दूरी नजदीकी हो न जाये 

तुमको करीब पाकर मैं पशेमान हो जाता हूँ 
कहीं मेरा साथ तुम्हारे लिए परेशानी हो न जाये 

तुमसे बातें भी करूँ तो अब किस तरह 'रतन'
कहीं फिर मुहब्बत की बदगुमानी हो न जाये 

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बर्बादी  ए किस्मत का तमाशा देखा 
न पूछो   इस  दुनिया  में  क्या देखा 
साकी मेरे पास  लाइ  पैगामेउल्फ़त 
मगर दूसरे के  हाथ में पैमाना देखा 
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Thursday, July 18, 2013

kya karoon..

दिल में ही नहीं रहा जब बाकी 
                अहसासे-मोहब्बत कोई 
होगी मुलाकात सफ़र में तुमसे 
                इन इरादों का क्या करूँ 
उठ उठ कर बदल जाने लगी है 
                जबसे हर निगाह 
हर गुल बन गया है काँटा 
                 तेरे सुरमई आरिजों का क्या करूँ 
दिल की तपती रेतीली जमीं पे 
                  न हुई जो इनायते-सावन कभी 
क्या ख़ाक गुल खिलेगा 
                  तेरी आँख की बरसातों का क्या करूँ 
बेकार हैं बातें उलफतो-मुहब्बत की 
                  बेकार कसमें गंगोजमन के  
बदल गया तक़दीर का पहलू तो 
                  इन सहारों का क्या करूँ 
मेरे  बहार तुम ही न कर सके 
                  सूरत कोई तसकीने-वफ़ा को पैदा 
फिर इन शाम की हवाओं 
                  इन मौसमी बहारों का क्या करूँ 
यूं तो गुल गुलचीं भी अपने थे
                  चमन भी अपना था 
कली न हुई अपनी तो तितलियों के 
                   रंगीं इशारों का क्या करूँ 
माना जख्म देने के बाद तुम 
                   मरहम भी लगाते हो 'रतन'
दिल पहले ही जख्मों से चूर है 
                    तेरे दिए जख्मों का क्या करूँ ....... 
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"तेरा रूप सिंगार है कुछ ऐसे

  झील में उतरा हो  चाँद जैसे "                    

Saturday, July 13, 2013

YE KYA KIYA ....

जला के ख़त मेरे सबके सामने 
                   ये तुमने क्या किया 
सोचा था  तुमको बावफ़ा 
                    निकले तुम बेवफा 

खता  क्या मालूम  नहीं 
                    जाने-अनजाने ये  क्या हुआ 
तुम थे मुस्सव्विर का कमाल 
                    दे दिया अनजाने में दगा 

समझे न थे फितरत  तुम्हारी 
                    किस जनम  का बदला लिया 
मज़बूर न होते  अगर हम  भी 
                     हम भी कर देते हर राज़ बेपर्दा 

समंदर का  उठान था  कभी 
                      प्यार हमारा तुम्हारा 
 डुबा दिया सफ़ीना ज़िन्दगी का 
                       पकड़ कर के किनारा 

न सोचते तुम्हारे बारे में कभी 
                       गरचे तुम  समझे होते पराया 
न सोचा था ,न सोचते थे दरअसल 
                        तुम्हे फूल समझे थे निकले काँटा 

किस दौर में आके ठहर गया 
                        फ़साना हमारा-तुम्हारा 
तुम गाफिल न थे मगर 
                        फिर भी समझे हमें बेगाना 

बेचने की कोशिश की जिसे 
                        तुमने सरे-बाज़ार 
ये फित्न तुमको महँगा पड़ा 
                         अनमोल था 'रतन' तुम्हारा     

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अगर किसी ने दुश्मनी 
                            जान-बूझ कर की है 
तो हमने भी जनम-जनम तक 
                             निभाने की कसम खाई है 
ये और बात है वो 
                             कायल न हो सरफरोशी का 
पर सर न झुका कर 
                             सर कटाने की कसम खाई है  
वो नहीं मिलता अगरचे 
                             ख्वाहिशे-अदावत रख कर दिल में 
हम भी न मिलेंगे उससे 
                              ता-क़यामत हमने भी कसम खाई है 

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                                                                 -->   राजीव 'रत्नेश'  
                                                                        ==========  

Monday, November 12, 2012

doosra mahabharat hone ko hai

कौन करेगा अब 
भ्रष्टाचार के खिलाफ 
सच का सामना 
है यह ध्रुव सत्य 
जो आगे बढ़ा सच के लिए 
खींच लिए पैर उसके 
और वो धराशायी हो 
ओंधे मुह ज़मीन पे गिरा 


सच है सत्ताधीशों के पास 
है हर मर्ज़ का इलाज़ 
जानते हैं अच्छी तरह 
कब है इसका इस्तेमाल करना 
पर इतिहास खुद को दोहराता है 
सत्ताधीशों को 
सत्ताविहीन कर देता है 


याद है अस्सी के दशक 
के प्रारंभिक चार  साल
की वो सम्पूर्ण क्रांति 
कितने वीर नौनिहाल 
जेलों में ठूस दिए गए
पब्लिक स्कूलों को 
जेल बनाया गया 

कितने सपूतों ने कुर्बानी दी 
कितनों पर तोहमत लगाई गयी 
वह युग जनजागृति का था 
तानाशाहों के मंसूबों पर 
पानी फिर गया 

और इतिहास में 
आदिम युग के आज तलक का 
ढाई साल का पहली बार 
और शायद आखिरी  बार
स्वर्णयुग आया 
नयी सौगातें लाया 
प्रजा प्रसन्न वदन थी 
महंगाई का नाम न था 
कम से कम रोटी ,
कपड़ा और मकान के लिए 
जनता खस्ता हाल न  थी 

हर तरफ रामराज था 
कहते हैं सतयुग जिसे 
वह बद से बदतर था
सच तो ये है 
सतयुग कभी था ही नहीं
भ्रष्टाचार का बोलबाला 
तब भी था 
लोग आदिम थे 
अन्धविश्वासी थे 

आदिम धर्मग्रन्थ ऋग्वेद 
जिसे श्रृष्टि की उत्पत्ति 
के बाद का पहला धर्मग्रंथ
बताया गया ,हास्य परक 
 कि ईश्वर की रचना है 
जो झलक मिलती है 
उससे अंतरात्मा काँप उठती है 

ब्राह्मणों की तोंद की खातिर 
रची गयी उस रचना के लिए 
ईश्वर के नाम पर 

लोगों को ठगना 
और जांति -पांति के नाम का 
ढोल पीटना 
यह गन्दगी श्रृष्टि की उत्पत्ति 
के साथ चली आती है
और नेस्तनाबूद तो कभी 
हो भी सकती है 

उसके लिए रन बाकुरों ने 
कमर कसी 
सबने कहा भ्रष्टाचार गलत है 
सबने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई 
सत्ताधीशों और अपनों को 
लगाने वालों ने 
झूठे वादे किए 
आश्वासन लिखित दिया 

और अपने हाथों अपने माथे पर 
कलंक विजय का टीका लगा लिया 
वादाखिलाफी की समाज के साथ 
और एक अंतहीन मर्यादा 
का उदहारण दिया 

'अहिंसा परमो धर्म: ' कह कर 
क्या हमें आज़ादी मिली है 
अहिंसा-अहिंसा करने वाले लोगों ने गोली खायी 
अहिंसा जपते-जपते बौद्धों ने गर्दन कटवाई 

आज सुभाष ,भगत,बिस्मिल
को हमने भुला दिया 
स्वतंत्रता-दिवस मानते हैं 
और गीत अंग्रेजों के गाते हैं 
गाँधी ने नारा दिया 
'अंग्रेजों भारत छोडो' 
पर है कोई माई का लाल 
यह कहने वाला 
भ्रष्टाचारियों विदेशों से 
काला धन वापस लाओ 
    
आज यदि देश क़ुरबानी 
को भुला देगा तो मैं नहीं समझता 
भ्रष्टाचारियों की सेना के सामने 
भीष्म्प्रणधारी  शरशय्या पर 
सोने को मजबूर न होता 

धर्मराज को झूठ बोल कर 
कर्ण से चाल खेल कर 
बालब्रह्मचारी के सामने 
'शिखंडी' को भेजकर     

यदि युद्ध जीतना कला है 
तो वाकई हमारे शासक 
कुलीनता के धारक हैं 

एक महाभारत हो चूका 
दूसरा अब होने को है ..
{
  जय प्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन  के संचालक तथा    सम्प्रति 'आज़ादी बचाओ 'के संस्थापक बनवारी लाल शर्मा के आकस्मिक निधन के बाद उनको स:सम्मान समर्पित .............................................}
                                                --राजीव 'रत्नेश' 


Wednesday, October 24, 2012

naman mitra naman tumko

मेरी दोस्ती का दम भरने  वाले 

शहर में हैं बहुत मेरे  दोस्त 

पर एक भी ऐसा नहीं जो 

वक़्त-ए -जरूरत सामने आये 

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कर्ण और कृष्ण 
महाभारत समर में 
दोनों का काम था 
अश्वसेवा 

एक जतिकुल हीन 
एक भगवान् कहाया 
दो माताएं दोनों की थीं 
पर भगवान् निर्मम हो 
जानते हुए सब कुछ 
अनजान बने रहे 

वक़्त कुटिल जान कर 
कर्ण को उसका वंश बताया 
विधि ने बार बार छला 
कर्ण को प्रण से डिगा न पाया 

निष्ठुर माँ ने जाना जब 
समर आने वाला कितना विकराल 
सगे पुत्र को अपनी करतूत सुनाया 

पर दानी कर्ण ने 
न ठुकराया न अपनाया 
दिया दान पांच बेटे सदा रहेंगे 
मिला अवसर भी तो पार्थ छोड़ 
न किसी और का वध करूंगा 

पर किसी तरह भी 
न मित्रद्रोह करूंगा 
सहज ही मृत्यु वरण करूंगा 
अगर इन्द्रसुत को न मार गिराया 

'नमन मित्र नमन तुमको 
तुम्हे शत-शत प्रणाम 
तुम सा युद्धवीर देखा किसने
तुम सा परममित्र पाया किसने 

तुम सा उदाहरण 
शिवि ,दधीचि न दे पाए 
अपना बदन छील कवच
छली इन्द्र का पकड़ाया 

पहचाने  जाने पर इन्द्र सकुचाया 
बदले में अमोघ शक्ति 
तुमको पकड़ाया 
तुमने मृत्यु समय भी दिया ही 
जीवन भर किसी से कुछ न माँगा 

आज तक इतिहास में 
ऐसा चरित्र न कोई रच पाया 
तुमसा दानी और परममित्र ,
न देखेगा न पाएगा 

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